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वर्ष: 2, अंक 29, जनवरी(द्वितीय), 2018



हम नहीं डरते


डॉ. दिनेश त्रिपाठी ‘शम्स’


 

हम नहीं डरते तिमिर के ज़ोर से, 
अन्ततः हम जा मिलेंगे भोर से।

आपकी निष्ठा अभी संदिग्ध है,
सच बताएं आप हैं किस ओर से।

हम चले आते हैं खिंचकर आप तक,
हम बंधे हैं प्रीति वाली डोर से।

लूटने को आ गए डाकू कई,
मुक्ति हमको मिल गयी जब चोर से।

मन के कोलाहल से बचने के लिए, 
हम मिले हैं दुनिया भर के शोर से।

वो हमें कब तक करेंगे अनसुना, 
आइये हम और चीखें ज़ोर से।

शम्स कुछ भी तो नहीं बोले मगर, 
कह दिया सब कुछ नयन की कोर से।


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