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वर्ष: 2, अंक 29, जनवरी(द्वितीय), 2018



दोहा बन गए दीप


सुशील शर्मा




प्रकृति का संरक्षण
जो मानव करता नहीं ,प्रकृति का सम्मान। रोग कष्ट संग जिए वो ,जल्द जाये श्मशान। प्रकृति का न शोषण करो ,प्रकृति हमारी जान। पशु पक्षी पौधे मनुज ,हैं धरती की शान। जहाँ पेड़ कटते रहे ,जंतु हुये शिकार रेगिस्तान वह धरा है ,बचा न कुछ आधार। पर्यावरण की छति का ,मनुज है जिम्मेदार। धन पैसे की लालसा , तनिक न करे विचार। जब तक हरियाली रहे , है जीवन की आस। बिना पानी कुछ न बचे ,जीवन है वनवास। मानव बड़ा अजीब है ,कर प्रकृति का नाश। संरक्षण करता फिरे ,मनुज महा बदमाश। पर्यावरण से जुड़ा है ,मानव का अस्तित्व। पर्यावरण की सुरक्षा ,उच्च करे व्यक्तित्व। बंजर धरती कह रही ,सुन लो मेरे पुत्र। गर तुम अब चेते नहीं ,मिट जाओगे मित्र। बच्चों को समझाइये ,बना बना कर चित्र। पर्यावरण रक्षित करें ,वृक्ष हमारे मित्र। हरा भरा पर्यावरण ,धरती माँ का स्वर्ग। नदियां कल कल जब बहें ,सुखी सभी संवर्ग। सौर ऊर्जा का विकल्प ,जीवन का आधार। संसाधन सब चुक गए ,किया न कभी विचार। शास्वत नभ में उड़ गया ,सपना सुघड़ अमोल। हरी भरी धरती रहे ,पर्यावरण सुडोल। पुलकित पंखों से उडी ,गोरैया इस बार। जाने कहाँ वो खो गई ,दिखी नहीं इस पार। सूखी नदियां कर गईं,मुझसे कई सवाल। रेत को हम क्यों बेचते ,जेब में भरें माल। पेडों को पानी नहीं ,मानव भूखा सोय। जंगल अब बचते नहीं,बादल सूखा रोय। उजड़े उजड़े से लगें ,मेरे सारे गांव। वीरानी बैठी हुई,उस बरगद की छांव। कोयल गौरैया नही ,गाय नही घर आज। कुत्ता गोदी में धरे ,जाता कहाँ समाज। माँ की आँखे देखती ,एक टक रास्ता आज। वो बेटा कब दिखेगा ,जिस पर उसको नाज। सूरज ठंडा सा लगे ,चांद ढूंढता रूप। पानी प्यासा सा फिरे,आग निहारे धूप। जंगल पर आरी चले ,नदी तलाशे नीर। जीवन सांसे ढूंढता,घाव निहारे पीर। पर्यावरण की सुरक्षा ,है पावन संकल्प। प्रकृति शरण में वास का ,बचता सिर्फ विकल्प।
कंजूसी
कंजूसी धन की भली ,मन का खर्चा लाभ। कंजूसी मन की करे,उसके फूटे भाग। रिश्ते कंजूसी भरे ,ढले स्वार्थ के संग। जीवन सस्ता हो गया, रिश्ते है बदरंग। तन खर्चे सुख मिलत है ,मन खर्चे है प्रेम कंजूसी इनमें करें ,उनकी कुशल न क्षेम। सारा जीवन कमा के ,रखा तिजोड़ी बीच प्राण पखेरू उड़ गये ,सुत ने दिया उलीच। वाणी कंजूसी करे ,तौल तौल के बोल ते नर आगे बढ़त है ,बोले जो अनमोल

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