Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 29, जनवरी(द्वितीय), 2018



नए दोहे


पुष्पा मेहरा


 
1.
नदिया आई राह पे,अपने घर को त्याग | कठिन राह पग धर चली,सोच यही निज भाग ||
2.
दिवस बटोही चल दिया,सौंप जगत को शाम | दीप जला कर चाँद का,निशा करे विश्राम ||
3.
धूप-दीप-नैवेद दे,पूजा प्रभु दिन-रैन | स्वर्ण हिरन की कामना,छीने मन का चैन ||
4.
चलते–चलते जब थकी,मन ने थामा हाथ | बोला रुकना मत कभी,मैं हूँ तेरे साथ ||
5.
दरिया बहता कपट का,मन में छल की आग | दाहक वन में घिर रहा,अब तो मन तू जाग ||
6.
निकलेगा सूरज नया,उजली होगी भोर | अब ना भीगेगा कहीं,किसी नयन का कोर ||
7.
ये मन कितना बावरा,भूला जग की नीति | दर दर ठोकर खा रहा,माँगे माणिक प्रीति ||
8.
इच्छा द्वारे पर खड़ी,करती है अरदास | सुख की छाया के तले,पूरी हो हर आस ||
9.
पूस माह की चाँदनी,हिम पातों की सेज || मन में राग जगा रहे,मौन मुखर छवि भेज ||
10.
आग वासना जल रही,मन के खंड प्रचंड | इच्छाओं की सीढ़ियाँ,नित ही बढ़ें अखंड ||
11.
पीर दुखों की पी थके,मन के कूप हज़ार | उमड़ उमड़ कर बह चले,अपनी हद के पार ||
12.
पाप द्रौपदी चीर सा,बढ़ा जा रहा आज | मुरली मनोहर तुम्हीं ,जगत की रखो लाज ||
13.
फुनगी पर बैठी चिड़ी,सोच रही रह मौन | धरती सारी जल भरी,दाना देगा कौन !!
14.
रूक्ष हुई सम्वेदना,बंद प्रेम के द्वार | अपने अपनों संग ही,करते हैं तकरार ||
15.
पाँवों में कंकड़ चुभें,चाहे सौ सौ शूल | सीता तुम चलती चलो,साथ राम ना भूल ||
16.
दरिया बहता कपट का,मन में छल की आग | दाहक वन में घिर रहा,रे मन!अब तू जाग ||
17.
रिश्तों में दरार पड़ी,टूटे सब अनुबंध | घर आँगन ज्यों ही बंटा,बिखर गये सम्बन्ध ||

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें

www.000webhost.com