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वर्ष: 2, अंक 28,  जनवरी(प्रथम), 2018



इंजीनियरिंग सपना


अरुण अर्णव खरे


आज के समय में बारहवीं पास करके इंजीनियर बनना सबसे आसान है -- अपितु ये कहना ज्यादा उपयुक्त होगा कि इंजीनियरिंग में एडमिशन लेना सबसे आसान है और एक बार एडमिशन से लिया तो इंजीनियर बन जाना भी तय है बस समय सीमा मत पूँछिए । पहले हर माँ-बाप का सपना होता था बेटा इंजीनियर बने -- आज भी है -- और बेटा इंजीनियर बन भी जाता है पर माँ-बाप के सपने फिर भी सपने ही रह जाते हैं । कुछ लोगों का मानना है कि इसके लिए सरकार ही दोषी है जैसा कि दूसरे अन्य सैकड़ों कार्यों के लिए होती है । सरकार हर बच्चे को इंजीनियर बनाने पर अमादा है । मेरे शहर की हर चौथी गली में एक इंजीनियरिंग कालेज खुल गया है । उस गली में पान की, सब्जी-भाजी की या किराने की दुकान हो न हो पर सरकार का मानना है कि वहाँ एक अदद इंजीनियरिंग कालेज ज़रूर होना चाहिए । सरकार खुश है कि उसने शहर को एजुकेशन हब बना दिया है । माँ-बाप खुश हैं कि उनका बेटा इंजीनियर बनने की राह पर है । कालेज संचालक भी खुश हैं कि दो-तीन सत्रों के बाद ही उनका पेट टेनिस की गेंद से फ़ुटबॉल जैसा हो गया है । एक मैं ही दुखी हूँ इतने सारे इंजीनियरों को देखकर -- जिनमें से बहुत से न घर के रहते हैं और न घाट के -- अनेकों को तो ढंग की नौकरी के लिए इण्टरव्यू कॉल तक नहीं आता । थक हार कर बेचारे सिपाही, चपरासी और चौकीदार तक बनने को विवश हो जाते हैं ।

मेरे मित्र मोतीलाल भी इंजीनियर बनना चाहते थे पर तब शहर में केवल एक इंजीनियरिंग कॉलेज था और पूरे राज्य में मात्र सात, अतएव नहीं बन पाए । पच्चीस साल तक वह इसी कुण्ठा में जीते रहे । अब जाकर उनके कुण्ठाग्रस्त जीवन में सर उठाकर चलने का मौक़ा आया था जब उनका बेटा इंजीनियर बनने के योग्य हो गया |

मोतीलाल ने अपने बेटे का एडमिशन पेमेण्ट शीट पर शहर के एक प्रसिद्ध कालेज में मेकेनिकल इंजीनियरिंग में करवा दिया । उन के बेटे ने ५४ प्रतिशत अंकों के साथ स्टेट बोर्ड से बारहवीं पास की थी । पहले इससे ज्यादा अंक लाकर भी मोतीलाल सपने में भी इंजीनियरिंग कॉलेज का गेट तक नहीं देख पाए थे पर बेटा तो लाइव सशरीर कॉलेज के अन्दर ही पहुँच गया | इस कामयाबी पर मोतीलाल का सीना ३२ इंच से एकदम ५६ इंच का हो गया । आजकल ५६ इंच के सीने का ख़ास महत्व है अतएव मोतीलाल का सीना न इससे ज्यादा फूला और न कम । वह ठीक वहीं आकर रुका । मोतीलाल के पूरे ख़ानदान में कोई इंजीनियर नहीं था सो सीना फूलना लाज़िमी था । वह भविष्य दृष्टा नहीं थे कि समझ पाते कि चार साल बाद ५६ इंच का सीना सिकुड़ कर वापस ३२ इंच का होनेवाला है और ऑंखें पलकों के अन्दर दुबकने वाली हैं । उन्हें इस सच्चाई से भी ज्यादा सारोकार नहीं था कि उनके समय मे पूरे प्रान्त से जहाँ डेड़ हज़ार ही इंजीनियर निकलते थे वहाँ अब केवल उनका शहर ही हर साल सत्तर हज़ार से ज्यादा इंजीनियर उगल रहा है । आधे से ज्यादा तो बेकार घूमते फिरते हैं और जो जॉब पा जाते है उनमें भी बहुत से ढंग का जॉब न पा सकने की निराशा में डूबे रहते हैं ।

उन्हें लगता था इंजीनियर बन जाने से व्यक्तित्व में ज़बर्दस्त उछाल आ जाता है व समाज में प्रतिष्ठा बढ़ जाती है । यह उन्हें किसी ने समझाया था या उनके उर्वरा दिमाग़ की उपज थी पता नहीं । वह अक्सर कहा करते थे - 'डॉक्टरी पढ़ने के बाद लड़के डॉक्टर ही बनते हैं वकालत पढ़ने पर वक़ील या कभी कभार कोई जज बन जाता है पर इंजीनियरिंग पढ़ने के बाद तो मंत्री, मुख्यमंत्री, आई०ए०एस०, आई०पी०एस०, फ़िल्म-एक्टर, कमेण्ट्रेटर, बिज़नेसमैन, अंतरिक्ष यात्री, लेखक, कवि और रिज़र्व बैंक के गवर्नर से लेकर न जाने क्या-क्या बन सकते हैं - यानि कि स्कोप ही स्कोप'।

किसी ने उन्हें छेड़ते हुए एक दिन कह दिया था - 'आपने आतंकवादी को क्यों छोड़ दिया -- लादेन भी तो इंजीनियर था'

मोतीलाल उसपर विफर पड़े थे बहुत बुरा-भला कहा था उसे । पर उनके जज़्बे में कहीं कोई कमी नहीं आई थी । मैं भी उन्हें बताना चाहता था कि अधकचरा इंजीनियर बनने से चपरासी की नौकरी तक मुश्किल से मिलती है पर मैं अपना एक मित्र नहीं खोना चाहता था अतएव नहीं बोल पाया ।

जब वह बेटे के साथ कालेज में उसका एडमिशन कराने गए थे तब भी उनकी आँखें खुल जानी चाहिए थीं पर वह आँखें मींच कर हवा के रथ पर सवार थे सो उन्हें कुछ समझ में नहीं आया । कॉलेज के गेट पर ही उन्हें एक स्मार्ट सा चौकीदार मिला था । वहाँ एडमिशन लेने आए बच्चों व उनके अभिभावकों की काफ़ी भीड़ थी अतएव अपने नम्बर के इन्तजार में मोतीलाल ने चौकीदार से ही अपने पुत्र के गुणो का बखान शुरुं कर दिया । बातों-बातों में उससे पूँछ बैठे - 'ये कॉलेज कैसा है -- यहाँ पढ़ाई बढ़ाई कैसी होती है'

'बहुत अच्छा कॉलेज है -- पढ़ाई भी बहुत ज़ोरदार होती है' - चौकीदार बोला ।

'हमारे बेटे को मेकेनिकल ब्राँच मिली है -- केम्पस सेलेक्शन की क्या पोज़ीशन है यहाँ पर' - उत्साहित मोतीलाल ने उससे पूँछा ।

'मेकेनिकल का तो पता नहीं सर -- मैं तो इलेक्ट्रीकल में था' चौकीदार ने भी दुगुने उत्साह से उत्तर दिया ।

पता नहीं मोतीलाल ने चौकीदार की बात का मतलब समझा या नहीं -- पर लगता है नहीं समझा होगा । यह उनके अगले कदम से स्पष्ट हो गया था जब उन्होंने ख़ानदान के चश्मों-चिराग़ का एडमिशन उसी कालेज में करवा दिया । चार साल हो चुके हैं उनके पुत्र को पढ़ते हुए । दूसरे सेमेस्टर के दो पेपर अभी भी रुके हुए हैं । बैंक वालों ने लोन के अगले भुगतान पर रोक लगा दी है और मोतीलाल को ब्याज भरने का तीसरा नोटिस रजिस्टर्ड पोस्ट से भेजा दिया है । मोतीलाल की ऊँची हुई नाक अपनी ओरीजनल साईज़ से भी नीचे आ गई है और उस पर अब ऐनक भी ठीक ये नहीं टिक पा रही है -- उनके अनेक यार लोग अपने कन्धों पर इंचीटेप लटकाए घूम रहे हैं कि मौक़ा मिले और उनको दबोच कर उनके सीने का लगे हाथ नाप भी ले लें कि अब ३२ इंच की भी बची है या नहीं |


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