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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



व्यंग्य कविता ( लोकभाषा में)
ओखली मा सिर डारा है

अमरेश सिंह भदोरिया

     
आप    सबकी   दया  भाव  का 
हमका       खूब     सहारा    है।
आपै के   भरोसे   हमहू  अबकी
ओखली     मा   सिर    डारा है।
	1.
रातिव दिन कसिके  स्वान्चा  है।
तब  दुई  कुंटल  गेंहू ब्यान्चा  है।
लालच   न  तनिको   ज्यादा  है।
बस  परधानी लड़ै का इरादा  है।
हाँथे   पर    हाँथ     धरे    घरमा;
अब   होत    कहाँ   गुजारा    है।
आपै के   भरोसे   हमहू   अबकी
ओखली     मा   सिर   डारा   है।
	2.
सुबह   हुए    या    शाम     सही।
दुई   रोटी   का   इंतज़ाम    चही।
हाथन   का   थ्वारा  काम   चही।
देहीं   का   पूरा    आराम    चही।
ई सब बातन  का  राजनीति   ही;
सबसे       बढ़िया    चारा       है।
आपै के   भरोसे   हमहू   अबकी
ओखली     मा   सिर   डारा   है।
	3.
बिन अनुभव कहाँ ठिकान मिली।
बिन पद के  कब पहिचान मिली।
यहु जरिया  जाना   पहिचान   है।
हर पंछी  का   यहिमा   दाना   है।
भठ्ठा औ मील   की   नौकरी   मा;
पहिलेन    से    मारी    मारा    है।
आपै के   भरोसे   हमहू    अबकी
ओखली     मा   सिर    डारा   है।
	4.
माना    दिग्गज      हैं    बड़े-बड़े।
दुई   चार   बेईमनवो   हैं     खड़े।
बन्दर-बटवल   नीति  हैं सबै पढ़े।
पर हमरी तुलना   मा   हैं तरे-तरे।
कुर्सी    वाली  बात  मा "अमरेश"
बस    एकाधिकार     हमारा   है।
आपै के   भरोसे   हमहू   अबकी
ओखली     मा   सिर   डारा   है।

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