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वर्ष: 2, अंक 28,  जनवरी(प्रथम), 2018



पुरूष सत्ता की बेड़ियों को तोड़ती दास्तान ‘इंतजार एक औरत का’
(तुलसी तिवारी की कहानी संग्रह में स्त्री पीड़ा)


जनकदेव जनक


बाजारवाद, आधुनिकता व स्त्री स्वतंत्रता के दावों के बावजूद स्त्री की सामाजिक स्थिति, उसका परिवेश, उत्थान और उसकी चेतना में कोई खास बदलाव नहीं आया है. हर जगह पुरूष सत्ता उसका पीछा करता रहता है. आज के परिवेश में औरत के लिए घर और बाहर एक सामान सिर्फ कहने भर को है, औरतों पर बढ़ रही घटनाएं उसका गवाह है. वह दोहरे मापदंडों में जीने को विवश है. लेकिन स्त्री संघर्ष के फलस्वरूप ही परंपरा और पैतृक सत्ता की बेड़ियों टूटी हैं. स्त्रियां संगठित होकर अपनी-अपनी लड़ाई खुद लड़ रही हैं. पारंपरिक दासता में बदलाव लाने की कोशिश जारी हैं. परिवर्तन के लिए स्त्री लेखन समय की पुकार है ताकि आम औरतों को जागरूकता बनाया जा सके. इसी कड़ी में लेखिका तुलसी देवी तिवारी का कहानी संग्रह मील का पत्थर है. इन कहानियों में स्त्री की आंतरिक व्यथा और दुर्दशा का बड़ा ही मार्मिक चित्रण मिलता है, जैसे रचनाकार ने अपनी पीड़ा को कथा साहित्य में आत्मसात कर दिया हो. उनके कथा साहित्य में स्त्री चेतना की जड़ें काफी गहराई तक देखने को मिलती है. उनके संवाद व कथानक इतने सरल व सरस होते हैं कि आम पाठक असानी से उनके कथ्य को समझ सकता है.

हालही में उनका नौवां कहानी संग्रह ‘इंतजार एक औरता का’ प्रकाशित हुआ है. इसके पूर्व उन्होंने एक उपन्यास, चार यात्रा संस्मरण, 11 बाल साहित्य छप चुका है. उनके नये कहानी संग्रह में 12 कहानियां शामिल हैं, जिनमें ‘अजगर, सेवाएं समाप्त, शाम ढली वो आई’ कहानियां ठगी पर आधिरत हैं. वहीं कहानी ‘सुहाग का पीढ़ा’ स्त्री त्याग, स्वाभिमान व संस्कार की कहानी है. जबकि कहानी संग्रह का टाईटिल नेम कहानी ‘इंतजार एक औरता का’ पुरूष प्रधान पैतृक सत्ता पर आधारित कहानी है जो औरत के स्वाभिमान पर चोट करती है.

कहानी ‘इंतजार एक औरता का’ की नायिका पढ़ी लिखी एक लेखिका है, जो काफी संस्कारी, स्वछंदता, उनमुक्त विचारों वाली हंसमुख चेहरे वाली है. वह अपनी व्यवहार कुशलाता से बच्चे, बूढ़े, जवान सभी को क्षण भर में अपना बना लेती है. उसकी यही विशेषता उसके अभिमानी पति को फूटी आंखों नहीं सुहाती. गोली बंदूक की बात करने वाला नायिका का पति सिपाही है. अधिक उम्र में उसकी शादी कमसीन गुड़िया सी नायिका से होती है, जो गांव में अपनी सास के साथ रहती है. उसका पति साल में कभी कभार एक-दो माह की छुट्टी पर घर आता है. वह भूखे शेर की तरह अपनी पत्नी को हवस का शिकार बनाता है, जिससे वह सहमी-सहमी सी रहती है. संस्कार में पली बढ़ी नायिका को पता है कि मायके से कन्या डोली चढ़कर ससुराल जाती है लेकिन उसकी अर्थी ससुराल से ही उठती है. इस पौराणिक बंधनों के कारण पति के अत्याचारों को सहर्ष स्वीकार करती है और जिद् कर पति के साथ उसके क्वार्टर पर आ जाती है. लेकिन पति के अव्यवहारिक कार्यकलापों से वह खिन्न रहने लगती है. कभी-कभी उग्र भी हो जाती है. दोनों के विचारों में खटास उत्पन्न हो जाता है. पति उससे दूर-दूर रहने लगता है. जहां उसका थाना था वही एक चाय वाली रहती थी. जिसके साथ उसके मधुर संबंध की खबर नायिका को मिलती है. उस वक्त नायिका का छोटा बच्चा बीमार रहता है. वह पति के पास जाकर घर चलने का आग्रह करती है. लेकिन उसका पति उसकी बातों को ठुकरा देता है और चाय पीने के लिए चायवाली के पास चला जाता है, जहां चाय वाली अपने पति को किसी बात पर डंडे से मार रही थी और गंदी-गंदी गालियां दे रही थी. वह बार-बार अपने पति से कह रही थी कि अगर अपनी नियत बदल दे तो बड़े-बड़े लोग उसे अपनाने को तैयार है. चाय वाली की हरकत से पति का मन खिन्न हो जाता है. उसे लगा कि जो औरत घर चलने के लिए उससे विनती कर रही है. उसकी वापसी के लिए रो रही है. उसे तो उसी औरत का इंतजार था ! इस कहानी में सौतिया डाह का चित्रण भी स्त्री सुलभ है. जब कोई दुधवाली उसकी अनुपस्थिति में उसके पति के साथ चुगलबाजी करती दिखाई देती है. उस वक्त नायिका का मन उग्र हो जाता है. वह अपने आप में कहती है कि जी चाहता है दुधवाली का लूगा खोलकर पूरी पुलिस लाइन में घूमा दे.

वहीं संग्रह की पहली कहानी ‘अजगर’ ठगी पर आधारित कहानी है. जिसमें खलनायक पवन नायक गौरव से दोस्ती कर आस्तीन का सांप बन जाता है. नायक की मां ललिता व पत्नी लक्ष्मी से धर्मपुत्र व देवर का भावनात्मक रिश्ता जोड़ लेता है. ठग पवन उन्हें कम समय में अधिक लाभ दिलाने का लालच देकर उनका लाखों रुपये नगद सहित अन्य संपत्ति लूट कर चंपत हो जाता है. जब वह कई दिनों तक घर नहीं आता है और न ही वह अपने ऑफिस में मिल पाता है. तब उन्हें पवन की काली करतूतें मालूम होती है. नायक गौरव को भी मालूम नहीं था कि पवन कौन है और कहां रहता है? उस घटना के बाद घर के लोग तनाव ग्रस्त हो जाते हैं. एक दूसरे पर दोषा-रोपण करते हैं. लेकिन पछताला के सिवा कुछ हाथ नहीं लगता.

कहानी ‘बोया पेड़ बबूल का ’ छल प्रपंच की कहानी है. जब विधवा शैल का अपना ही पुत्र चंद्र व बहू चांदनी, बाप के मरने के बाद मिली ग्रेच्यटी की राशि और मां के पैसों से नया फ्लैट खरीदते लेते हैं. गृह प्रवेश के बाद तो चंद्र अपनी मां, भाई प्रकाश आदि के साथ हंसी-खुशी उस घर में रहता है. लेकिन कुछ दिनों बाद बहू चांदनी अपनी सास को पुरानी खोली में रहने के लिए भेज देती है. कहती है कि खोली में नहीं रहने से कोई हड़प लेगा. दुर्भाग्य की मारी विधवा शैल पुन: उसी खोली में रहने के लिए आ जाती है. विदित हो कि शैल का पति सिपाही था. उसके निधन के बाद पति की जगह बेटे चंद्र को अनुकंपा पर नौकरी दिलाती है, जबकि दूसरे पुत्र प्रकाश की वह उपेक्षा करती है. लेकिन जिस पर वह भरोसा करती है वही उसे दगा देता है. लेखिका ने पुरानी खोली की उपमा नसकट चोली से किया है. वहां रह रही नायिका शैल को खोली गले में फंसी ब्लॉज की तरह लगती है. कहीं-कहीं संवाद छत्तीसगढ़ी भाषा में हुआ है जो कहानी को यथार्थपरक बनाता है.

भोजपुरी भाषा में पूरबी गीतों के जनक महेंदर मिसिर है. लेखिका ने अपनी कहानी‘ सेवाएं समाप्त’ की शुरूआत मिसिर जी के मशहूर गीत से की है. लेकिन कहानी में उसका बोल गलत है. सही बोल,‘अंगुरी में डंसले बिया नगिनिया रे, ए ननदी दियरा जरा दे, दियरा जरा दे अपना भईया के बुला दे, पोरे पोरे उठेला लहरिया रे ....’ है. इस गीत को सुनने के बाद बॉलीवुड अभिनेता मनोज वाजपेयी पटना स्थित प्रेमचंद रंगशाला आये थे. पिछले एक साल में पुरबिया तान के तहत महेंदर मिसिर के सात गीतों को साउंडक्लाड के जरिये जारी किया. यह महेंदर मिसिर के गीतों का ही जादू है कि उन्हें हम से बिछुड़े 68 साल हो गये लेकिन उनके गीत आज भी समसामयिक है.

बहरहाल, ‘सेवाएं समाप्त’ ठगी पर आधारित कहानी है. जिसमें कहानी नायिक कामना एक गायिका है,जो अपना कार्यक्रम पेश कर बाहर निकलती है तभी उसका मोबाइल एक युवक खेमराज आकर देता है. गायिका उसकी ईमानदारी पर खुश होती है. इसी बहाने दोनों में परिचय बढ़ता है. गायिका की मदद से बेरोजगार खेमराज को नौकरी व गायिका की हवेली में ही रहने का ठिकाना मिल जाता है. दोनों आजू बाजू रहने लगते हैं. इसी बीच एक दिन खेमराज कामना से पूछता है कि सर्वगुण संपन्न रहने के बावजूद आपने अभी तक शादी क्यों नहीं की? कामना अपने शारीरिक खामियों को उससे साझा करती है. जिस देख व सुनकर खेमराज भावुक हो जाता है और खुद उससे शादी करने का आग्रह करता है. कुछ समय बाद दोनों शादी कर लेते हैं. पति पत्नी की तरह जीवन बीतने लगता है. इसी बीच खेमराज पुरानी हवेली बेचकर नये डिजायन का घर बनाने पर जोर देता है. साथ ही 25 लाख रुपये में हवेली बेच कर पैसे बैंक में रख देता है. एक दिन वह घबराया हुआ कामना से कहता है कि उसकी मां बीमार है, वह आज घर जा रहा है. जल्द ही लौट आयेगा. पति के जाने के बाद कामना की नजर टेबल पर रखे बैंक के पास बुक पर पड़ती है. वह पास बुक खोल कर दोखती है तो उसका होश उड़ जाता है. पास बुक में पैसा शून्य था.

कहानी ‘दावेदारी’ पैतृक संपत्ति विवाद की कहानी है. सुप्रसिद्ध अधिवक्ता कमल किशोर के मरने के बाद अंतिस संस्कार के लिए उनकी बेटी कंचन,कनक और मणि बाप के घर पहुंचती हैं. बाप के दाह संस्कार से पूर्व ही अपनी विधवा भाभी माला से चाबी मांग लेती हैं. बाप की संपत्ति हासिल करने के लिए पहले कौन उनके पिता को मुखाग्नि देगा, उसके लिए तीनों बहनें आपस में एक दूसरे की उपेक्षा व तिरस्कार करते हुए झगड़ती हैं. तीनों चाहती हैं कि उनका पुत्र ही अपने नाना को मुखाग्नि दे, ताकि पैतृक संपत्ति पर उनका अधिकार हो जाये. स्थानीय लोगों के सहयोग से वकील साहब की अर्थी श्मशान तक पहुंचती है. ऐन मौके पर अधिवक्ता संघ के अध्यक्ष अजी सिंह पहुंचते हैं और वहां तीनों बेटियों की दावेदारी देखकर दुखी होते हैं. तीनों को फटकार लगाते है. उसके बाद अधिवक्ता कमल किशोर के दिवंगत पुत्र आकाश की विधवा पत्नी माला व उसके पुत्र अमृत को श्मशान में बुलवाते हैं. सबकी उपस्थिति में पौत्र अमृत अपने दादा कमल किशोर को मुखाग्नि देता है. जिस पर वकील साहब की तीनों बेटियां केस लड़ने की धमकी देकर अपने अपने घर चली जाती है.

‘एक बार इशारा किया होता’ कहानी त्रिकोणीय प्यार की कहानी है. नायक संपत पहले से शादी शुदा है. वह अपने पड़ोस की शिक्षका तृष्णा व पंचायत विभाग में काम करने वाली निशा ठाकुर से प्रेम करता है. एक समय ऐसा आता है जब संपत शिक्षिका के साथ रहने लगता है. लेकिन निशा ठाकुर को यह रिश्ता किसी भी हाल में स्वीकार नहीं होता. वह तुरंत संपत को अपने पास बुला लेती है. तृष्णा से बिना कुछ कहे संपत गायब हो जाता है. जिसके के लिए संपत के परिवार वाले और शिक्षका तृष्णा काभी चिंतित होते हैं. जब तृष्णा स्कूल जाती है तो उसे उसके साथी उसे घर पहुंचा देते हैं और बताते हैं कि अखबारों में संपत व एक लड़की के आत्म हत्या करने की खबर छपी है. यह खबर पढ़ते ही तृष्णा के मनो:मस्तिष्क में एक विचार आता है कि संपत यही करना था तो एक बार इशारा तो किया होता! तृष्णा का मन पश्चताप की आग में जलने लगता है . लेखिका तुलसी तिवारी की कहानी ‘तुम नहीं बदली’ और ‘समय समय की बात ’ पठनीय है. उम्मीद की जा रही है नव वर्ष 2018 में लेखिका का स्त्री जागरण अभियान जारी रहेगा.

समीक्षित कृति : ‘इंतजार एक औरता का’
लेखिका : तुलसी देवी तिवारी
प्रकाशन : एडुक्रेशन पब्लिसिंग
आरजेड-94, सेक्टरj-6,द्वारका,
नई दिल्ली 110075
मूल्य : 220/-
पृष्ठ संख्या : 144
ईमेल : tulsi1954march@gmail.com


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