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वर्ष: 2, अंक 28,  जनवरी(प्रथम), 2018



शर्म


शशांक मिश्र भारती


अपने दोनों बच्चों को रोटी के फुलके खाते देखा तो मालती की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े।

किन्तु अधिक देर तक वह अपने बच्चों से आंखें न मिला सकी। सिर घुटनों में छुपा लिया। क्योंकि निराश मालती को इन फुलकों के लिए अपने आपकों बेचना पड़ा था।


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