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वर्ष: 2, अंक 28,  जनवरी(प्रथम), 2018



रिजर्वेशन टिकट


राजीव कुमार


”22 अगस्त को मेरे भैया का जन्मदिन है। मैं एक महीना पहले मायके जाऊँगी।” सुधा के स्वर में प्रतीक्षा स्पष्ट प्रतीत हो रही थी। शशांक ने बाल पर कंघी घुमाते हुए कहा, ‘‘तीन बार बोल चुकी हो, अपने पतिदेव पर भरोसा नहीं क्या?’’ शशांक के चेहरे की खुशी कुछ और बयाँ कर रही थी और उसकी आँखें कुछ और समझा रही थीं।

एक दिन लिफाफा सुधा की तरफ बढ़ाते हुए शशांक ने कहा, ”जानेमन, ये लो टिकट रिजर्वेशन करवाया है। हाँ, ये बात और है वेटिंग लिस्ट में है, लेकिन कनफर्म हो जाएगा।”

”कनफर्म हो तो जाएगा न?” सुधा ने उत्सुकतावश पूछा।

”हाँ-हाँ, क्यों नहीं? ये भी कोई पूछने की बात है?” शशांक सुधा को गले लगाते हुए बोला।

कुछ दिन के बाद सुधा ने फिर उत्सुकतावश पूछा, ”वेटिंग धीरे-धीरे घट तो रहा है न?”

”हाँ-हाँ, बेशक।”

जैसे-जैसे समय नजदीक आता गया, सुधा की बेताबी और शशांक की चालबाजी बढ़ती गई।

शशांक ने कहा, ”लगता है, जन्मदिन के एक महीना पहले मायके नहीं जा पाओगी। वेटिंग तो घटने की बजाय बढ़ती ही जा रही है।”

”मेरा दावा है कि जन्मदिन के दिन तुम मायके में रहोगी।”

20 अगस्त के दिन शशांक ने कहा, ”तुम्हारा भाग्य बहुत खराब है। टिकट कनफर्म नहीं हो पाएगा। भीड़ इतनी ज्यादा होती है कि जनरल बोगी में जाना संभव नहीं है।”

सुधा ने भी एक लिफाफा निकाला और शशांक को दिखाते हुए बोली, ”मैंने रिजर्वेशन पहले ही करवा लिया था, दो बर्थ है और दोनों कनफर्म हैं। तुमको अगर नहीं जाने का मन हो तो एक बर्थ केंसिल करवा दूँगी। टिकट काउंटर पर पता चला कि तुम जानबूझकर वेटिंग को और आगे बढ़वाते थे। उसी ने मेरा भी टिकट काटा, तुम्हारे बचपन के दोस्त ने।”

शशांक शर्म से गड़े जा रहा था और सुधा पैकिंग करने में जुट गई।


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