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वर्ष: 2, अंक 28,  जनवरी(प्रथम), 2018



दूध का कर्ज


राजीव कुमार


अपनी माँ से छोटी सी बात पर अनबन होने के कारण गौरव ने माँ से दूरी बना ली। वो माँ के साये से भी कतराने लगा। माँ के विशाल दिल ने तो गौरव को कब का माफ कर दिया, मगर गौरव का गुस्सैल दिल अपनी माँ को कभी माफ नहीं कर पाया।

गौरव की माँ को इस बात का यकीन था कि हर घाव की तरह वक़्त का मरहम ये घाव भी भर देगा, मगर अफसोस कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। एक दिन गौरव ने अपनी माँ से कहा, ”मैंने आज तक तुमसे एक रुपया भी नहीं लिया है। पापा की मृत्यु के बाद अपनी व्यवस्था खुद कर रहा हूँ, और देखना एक दिन तुम्हारे दूध का भी कर्ज चुका दूँगा।“ गौरव की बातों में गुस्सा स्पष्ट झलक रहा था।

गौरव की माँ ने चेहरे पर मुस्कान लाकर उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ”कैसी बात कर रहा है पगले? दूध का कर्ज भी भला कोई चुका सका है? बेटा, तू जबसे मुझसे गुस्सा हुआ है, मैं तो तिल-तिल मर रही हूँ।“

गौरव ने गुस्सा नहीं छोड़ा। अब गौरव की माँ डिप्रेशन में रहने लगी।

एक साँझ समाचार सुनते-सुनते गौरव की माँ ने गौरव से कहा, ”बेटा, तू मेरे दूध का कर्ज चुकाना चाहता है न? अब अवसर आ गया है। इस अवसर को हाथ से जाने मत दो। राष्ट्रपति ने देशवासियों से अपील की है कि देश की रक्षा के लिए आगे आएँ। आ बेटा, वतन पे शहीद हो जा, मैं समझूँगी कि तुमने मेरे दूध का कर्ज उतार दिया।”

राष्ट्रभावना से प्रेरित होकर गौरव चला गया सरहद पे। दुश्मनों से लड़ने के बाद, जब गौरव का शरीर तिरंगे में लिपटा हुआ अपने गाँव पहुँचा तो उसकी माँ माथा चूमते हुए बोली, ”बेटे, तुमने मेरे दूध का कर्ज उतार दिया। मैं कितनी सौभाग्यशाली हूँ।” बोलकर अपने बेटे के सीने पर झुकी और प्राण त्याग दिए। गौरव और उसकी माँ दोनों के चेहरे पर गर्व की स्पष्ट रेखा उभरी हुई थी।


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