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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



मैं कवि...


विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र'


  

कभी अक्षर की खेती करता
        कभी वस्त्र शब्दों के बुनता
बाग लगाता स्वर-व्यंजन के
        मात्राओं की कलियां चुनता
मैं कवि, कृषक के जैसा
        करता खेती कविताओं की
और कभी बुनकर बन करके
        ढ़कता आब नर-वनिताओं की
भूत-भविष्य-वर्तमान  सभी
         तीनों काल मिले कविता में 
बर्फ के मानिंद ठंडक मिलती
          ताप मिलेगा जो सविता में
मैं भविष्य का वक्ता मुझको
          सूझे तीनों काल की बातें    
ं मेरी ही कविता को गायक
          कैसे-कैसे स्वर में गाते
वेद पुराण गीता और बाईबल
          ये सब मेरे कर्म के फल है
डरते मुझसे राजे-महाराजे
          कलम में मेरी इतना बल है
             


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