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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



क्षणश्री


सुजश कुमार शर्मा


    

तुम्हारी यादों ने मुश्किल कर रखा है
फिर भी यह मेरा सर्वोच्च शिखर नहीं
मुझे अपनी क्षमता मालूम है,
क्यों मैं वहाँ तक नहीं पहुँच पा रहा हूँ!
क्यों?
ओ मेरी छटपटाहट
कहाँ हो तुम?
मेरे तड़पने की क्षमता असीम
बोलो, कहाँ पीछे रह गए तुम?
और तुम्हारी टोली!

यह जीवन की होली क़रीब है
मेरे वजूद के जर्रे-जर्रे में रंगते जाना है तुम्हें
          मोहब्बत का गाढ़ा रंग,
बुलाओ, अपने बिलबिलाहट को,
चीख़न को, घुटन को,
साँसों के उखड़ने को,
अरे, और भी थे तुम्हारे सखा सब,
वो रोना
अकेले में बोलते रहना
और सब में वही वही चेहरा दिखना
कहाँ गए ये सब लोग!

आओ भाई, उमर बढ़ गई तो क्या?
होली तो वही है
होली खेलने का ढंग वही
फिर तुम सब का होना भी वही है,
सच है
गाओ, अपने पुराने सब फाग 
चलो बजाओ ख़ुशियों के नगाड़े
खाओ उल्लास के बतासे,
पी जाओ, वही सनातन प्रेम का
कभी न उतरने वाला भाँग,
बताओ, क्या है माँग तुम सबकी?

पहन आओ नए सफ़ेद कपड़े
कि फिर फोड़ो मस्ती की मटकियाँ
फिर गिरो और
सराबोर होते जाओ रंग में,
शरमाओ मत यारों!
ये वक़्त मेरी दुलहन है
चीख़ो इसका नाम, साँसों के उखड़ने तक
छटपटाओ ग्रीवा नस के तनते तक,

ओ क्षणश्री!
पूर्ण प्रेम की यह होली मुबारक़ हो।

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