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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



सुनो


शुचि 'भवि'


 
सुनो
एक अजीब सी क़ैद हो तुम
कुछ-कुछ सुखद  सी  मगर,
बंधन भी सारे  तुम्हारे आज
क्यों लगने  लगे इतने  प्यारे,
अपना  वजूद  दफ़न किया
और  ज़िंदा हुई  हूँ तुमसे ही
घमंड  इस बात का हो गया
तुम्हें ?
स्वतः ही तो क़ैद स्वीकारी थी
अब क्यों आज़ाद किया तुमने,

सुनो
उड़ने   दो   न   मुझे  तुम  अब
अपनी बाँहों के  खुले आकाश,
ये बाहुपाश ही तो साँसें  हैं मेरी
ज़िंदगी ज़िंदा  रहती उनमें  बंध,
आज़ादी माँगी नहीं इसलिए ही,,,

मगर अना तुम्हारी  क्यों  इसमें 
भी नाख़ुश ?
कर  दो  फिर आज़ाद हमें तुम
केवल बाँहों के चक्र से ही नहीं
साँसों औ' लम्हों के चक्र से भी,,,,,,
 
ख़ुशी अब भी तुममें ही तो क़ैद है 
हमारी!!!!!



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