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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



ज़िंदगी की दौड़


कमलेश यादव


 
ज़िंदगी की दौड़ कैसी है,
ये कैसी होड़ मची है
यूँ तो जाना कहीं नहीं है 
फिर भी बड़ी हड़बड़ी है


किताबों की फ़ेहरिस्त है, 
पर पढ़ने का वक़्त नहीं है
कहने को तो अपने बहुत है 
पर मिलने का समय नहीं है


व्यस्त है सब पर मन में बेचैनी है, 
जाने कौन ग़लत और कौन सही है
दूसरों को अच्छा लगे की चिंता है, 
पर ख़ुद की फ़िक्र नहीं है


सबके अपने-अपने झूठ और सच है, 
मन कहीं पर और मत कहीं और है
अपनी- अपनी बात कहने की होड़ है, 
लेकिन दूसरों को समझना यहाँ गौड़ है


समाधान की कमी नहीं है,
और ना ही समस्या बड़ी है
बस एक पल सोचने की देर है, 
ज़िंदगी सामने खड़ी है

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