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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



धूप बैठी छत पर


अशोक बाबू माहौर


 

धूप
बैठी छत पर
सुबह की 
निहार रही 
आँगन 
दीवाल को 
घर को 
ताकि उछल कूद सके 
बेहिचक, 
कर सके क्रीड़ाएँ 
अनेक 
बच्चों सी 
मधुर।


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