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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



"मिथिला की सीता"


अपर्णा झा


 
मिथिला की हर नारी सीता
हर नारी में सीता
मां मेरी मैथिल
इस कारण....
मां मेरी सीता
जन्म कर्म का जोड़ यही
मां  बन गई सीता...
उसने जो जाना सीता 
जिसको उसने माना सीता 
हमें सीख में दे गई वो सीता 
पोथी रामायण की 
आदर से पकड़ाकर  बोली
बेटी तुम मिथिला की...
मैं ना बताऊंगी और ना
समझाऊंगी
मेरी नज़रों में क्या है सीता...
परिपक्व हो गई अब तुम तो
कौन सा पक्ष सीता का 
तुझे है भा रहा...
तेरी नज़रों में है किसी सीता
बचपन गुज़री,खुशियां यौवन की
अबतक सीता का मर्म ना
मैंने समझा
गार्हस्थ जीवन है अब तो
जोड़ कई संघर्षों  का
अहंग अहंग से भिड़ता-लड़ता
ऐसे में क्या कहती सीता...
अब तो मैं भी जीती सीता
खुद में कैसी चीख ये आई
क्यों जन्म मेरा सीता धरा
मेरी नज़रों में सीता
यानी 'हर बातों में है झुकना'
आज यक्ष प्रश्न का मुझ पर
भी प्रहार हुआ
हर संवाद मां का यानी सीता
फिर याद हुआ
गलत नही तो  झुकना कैसा
तर्कों में फिर जवाब हुआ
अब बाबूजी की बारी आई
शालीनता से जो वो कथ्य कही
"ये तो सब है प्रभु की माया...
बेटा स्त्री होती है सही हमेशा 
झूठे अहंग को ही हमेशा वो
मान-सम्मान है मानता
तुम पत्नी हो, तुम उसकी हो प्रेमीका
जी जाने दो अहंग के उसको
इस बात को वह भी है जानता
सीता का मर्म यही...
हो तुम परिवार की शीर्ष और आधार
तुम ही बिखर गई तो
कैसे सुदृढ हो संस्कृति और संस्कार
अब तुम सही अर्थों में समझोगी
कौन थी वह सीता
किस मिट्टी से बनी थी मिथिला
माँ यानी सीता मंद-मंद मुस्कुरा रही
बाबूजी यानी नींव की 
मजबूती को सराह रही
और मैं अब...
असल मैथिलानी हूँ
बन सीता  अपने राम को
संवार रही हूं...
"रामराज्य होगा " खुद में ये
सोच जगा रही हूं
मतिभ्रष्ट ना होने पाए मेरे राम की
कोशिश मेरी बस उस धोबी के
पहचान की
धन्य है मिथिला...
धन्य है राजा जनक
जो है पिता...
जय हो राम लक्ष्मण जानकी
जय बोलो भगवान की.

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