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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



मन को भरमाती अनुराग की चुभन


डॉ. रंजना वर्मा


 
 
 
मन को भरमाती अनुराग की चुभन ।
सतरंगी  रंगों  से   भर  गया  गगन ।।

रजनी  को   घर  आये   हुई  नहीं  देर,
झाँक रहा चाँद थाम क्षितिज की मुँडेर ।
सरपत  के  पीछे   है   डोलता   चकोर,
खुद में ही सिमट गये कमल अरु कनेर ।

रजनी की खुशबू को ढो रही पवन 
सतरंगी  रंगों  से  भर  गया  गगन ।।

बादल की पगड़ी पर लाल रंग डार ,
संझा का घरवाला बन गया गंवार ।
चुनमुन चिरैया - सी  हवा नाच कर -
धरती के आँगन है  बिखराती प्यार ।

देखी सुघराई तो नाच उठा मन ।
सतरंगी रंगों से  भर गया गगन ।।

इमली  की  टहनी  को  होंठ  ने छुआ,
मन को बचपन का एहसास सा हुआ ।
साँसों  में  गन्ध  घुली  हरसिंगार  की
अमवां  की  डाली  पर  डोलता  सुआ ।

दूध धुली रात खिली मन हुआ मगन । 
सतरंगी  रंगों   से   भर  गया  गगन ।।

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