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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



कौन बचाए


पीयूष कुमार द्विवेदी 'पूतू'


 
 
राज यहाँ अंधे-बहरोँ का,इनसे कौन बचाए।
चोर-उच्चके मौज मनाएँ,आँसू ईमान बहाए॥

लोकतंत्र की परिभाषाएँ,अब तो बदल चुकी हैं।
अन्यायी शासन के आगे,गर्दन सभी झुकी हैं॥
इक-दूजे की टाँग खींचना,राजनीति कहलाए।
राज यहाँ अंधे-बहरोँ का,इनसे कौन बचाए॥1॥

जिस पर हमको गौरव था,भारत देश कहाँ है अब?
आजाद-भगत के सपनों वाला,वह प्राणेश कहाँ है अब?
नहीं रेंगते कानों में जूँ,भारत माँ चिल्लाए।
राज यहाँ अंधे-बहरोँ का,इनसे कौन बचाए॥2॥

काला अक्षर भैंस बराबर,अगर तुम्हें लगता है।
तनिक नहीं 'पूतू' घबराना,संविधान कहता है॥
वोट खरीदे नोट चुकाकर,मंत्री जो बन जाए।
राज यहाँ अंधे-बहरोँ का,इनसे कौन बचाए।।3।।

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