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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



रिश्ता पुराना हो गया

डॉ० अनिल चड्डा

     
रिश्ता पुराना हो गया   
जाने कहाँ खो गया   

मैं तो बताता राह रहा,
वो राह अपनी चलता रहा,
मैं कुछ और उसे कहता रहा,
कुछ और वो समझता रहा,
जब समझना उसे चाहिये था,
जोने क्यों वो सो गया

दीवानों की ये बस्ती है,
दीवानों सा मैं हो गया, 
कुछ भी नजर आये मुझे, 
वो शब्दों में समा गया, 
पढ़ कर अपनी ही बातें,
अनायास ही मैं रो दिया 

दिल बोले क्या, न समझूं मैं, 
पन्नों को बस रंग दूँ मैं,
तुम समझो तो बतला दो मुझे,
जो गलत हो उसे बदल दूँ मैं, 
लौटाया इस जग को वो,
जग ने मुझको जो दिया

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