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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



जान मैं ही दूं


यूसुफ़ रईस


 
क्या मेरी जान,जान मैं ही दूं
इश्क़ का  इम्तिहान मैं ही दूं ।

अपने वादे से तुम मुकर जाओ 
और अकेला ज़बान मैं ही दूं ।

इक तो ख़ुद का ख़्याल भी रक्खूं
और तुम पर भी ध्यान मैं ही दूं।

तुम भरम रक्खो पारसाई का
सबको  झूठा  बयान मैं  ही दूं ।

देके परवाज़ के हुनर सारे 
तुझको  फिर आसमान मैं ही दूं।

खेत बंजर है कितनी सदियों से 
फिर भी सारा लगान मैं ही दूं ।

तुमको अल्फ़ाज़ दे दिये अपने 
अब क्या अहले-जुबान मैं ही दूं

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