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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



मकां के वालिद


डाॅ. कौशल किशोर श्रीवास्तव


 
ऐसे लम्हे भी पास आते हैं,
हमारी रोशनी चुराते हैं।

दायरे रोशनी के मन में हैं,
परे हम देख नहीं पाते हैं।

खुद की तारीफ में जो डूबे हैं,
डूब कर जिन्दगी गंवाते हैं।

सलाह कर किसी को मत देना,
वक्त से लफ्ज उलट जाते हैं।

जमीं तुम्हारी और मकां उनके,
और वे आंख भी दिखाते हैं।

तुम्हारे नये मकां का वालिद हैं,
ये खण्डर हैं सब बताते हैं।	

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