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वर्ष: 2, अंक 28, जनवरी(प्रथम), 2018



हर लफ्ज़ खंजर हो गया
कौशल किशोर श्रीवास्तव

 
  
आपकी तारीफ का हर लफ्ज़ खंजर हो गया 
खाद इतनी डाल दी कि खेत बंजर हो गया

एक के दो किये टुकडे उनके टुकड़े कर दिए 
देखिए चारों तरफ टुकड़ों का मंजर हो गया 

तंदुरुस्ती बनी जिससे वह तो खेतों में उगा
उगाने  वाला उसे पर अस्थि पंजर हो गया

आपने बस प्रेम की लहरें गिनी है बैठकर 
जिसने देखा डूब कर वह एक कलंदर हो गया

दुनिया ने चाहा पकड़ना कब्र तक जाते हुए 
हाथ जिसने खुले रखे वह सिकंदर हो गया

किनारे से जो बंधी वह नदी बनकर रह गई 
जिसने तोड़े किनारे वह एक समंदर हो गया   
		 
 

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