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वर्ष: 1, अंक 8, फरवरी, 2017



दिन की फसल

स्वर्णलता ठन्ना

समय काट रहा है
हाथ में हंसिया लेकर
दिनों की फसल
सुबह की किरणों में
जगमागते लम्हें
गेहूँ की सुनहरी 
बालियों के समान
दिखाई देते हैं
और चलने लगता है
समय का हंसिया
उन पर...

नहीं सहे जाते समय से 
पतझड़ के बाद बचे
ठूँठ वृक्ष
और तेजी से काटने में
तल्लीन हो जाता है
वह वसंत के पहले के
बचे हुए दिनों को
और इस तरह
छा जाता है वसंत
धरा के आँगन में
तब भी समय
अपनी आदत के अनुसार
चलाता रहता है
अपना हंसिया

चैत के लम्बे और
वैशाख के तपते-झुलसते
दिनों को भी
अपना पसीना बहाता समय
काटता ही जाता है
धीरे-धीरे
ठेलता जाता है वह
ऋतुएँ और
मिट्टी की सोंधी महक के साथ
पहुँच जाता है
सावन की रिमझिम में
नम, आर्द्र दिनों को सेंतने
चाहे उसके सामने
कैसे भी दिन क्यों न हो
किसी उत्सव, त्योहार,
खुशी  या गम
सभी दिनों को वह
उसी गति से
काट-काट कर
लगा देता है
अतीत के मैदान में ढेर
ठिठुरते हुए दिनों पर
जमी बर्फ को हटाते
जम जाते हैं उसके हाथ
और बढ़ जाती हैं
ठंडे दिनों की अवधि
पर समय...!
समय रूकता नहीं
कभी किसी कारण 
और धीरे-धीरे
बदल जाते हैं सारे मौसम
ऋतुएँ आती है
और काट ली जाती है
समय से...
प्रश्न  घुमड़ता है कई बार
मन में
समय ! तुम्हारे विश्राम के लिए
कोई समय नियत नहीं क्या...?
क्या तुम
कभी नहीं थकते...?
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