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वर्ष: 1, अंक 8, फरवरी, 2017



आवरण

स्वर्णलता ठन्ना

झुठलाकर दुनिया के दस्तूर
निर्मित एक नया क्षितिज
एक भ्रम मात्र 
किन्तु
आप्लावित
इंद्रधनुष के रंगों से...।

निर्मित हृदय की विशालता से 
गगन और 
धैर्य से धरा
अश्रुओं से सिंचित 
एक महान उदधि
जिसके आगोश  में
अतुलनीय, अमूल्य
भावनाओं के रत्न
और
कल्पनाओं के पुष्प...।

संस्कार से सुगंधित, 
सुवासित
निर्मल सी मुस्कान
विस्तृत, नीरव नभ के 
शून्य को निहारती
कजरारी अँखियाँ
जिनसे प्रवाहित
नेह रुपी मोती
बिखरते अपनी सीपी से

बाह्य दिखावे से
एकदम दूर
नितांत एकांत में
निर्मिमेष 
ताकते नैनों में समाहित
सारे राग-द्वेष
क्षार युक्त इस
मानस जलधि में
कहीं विलीन हो
देकर जाते
प्रसन्नता का आवरण...।
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