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वर्ष: 1, अंक 8, फरवरी, 2017



बसंत

राजेश्वरी जोशी

आजकल धीरे -धीरे आता है बसंत        
सहमा -सहमा सा रहता है उसका मन |
धीरे -धीरे सरसों को झुलाता है बसंत,
धीरे से अमवा को महकाता है बसंत | 

दहशतगर्दों से लगता है उसको डर ,
बहते लहू को देखकर रोता है मन|
टेसू से भी दहशत ख़ाता है बसंत,
गुलमोहर में भी लहू बताता है बसंत |

कोयल की कूक से भी नही बहल पाता बसंत ,
माँ की चीखों से दहल जाता है बसंत|
मज़हबी दंगों से डर जाता है बसंत,
आजकल कोई गीत नही गाता बसंत |

गोरी को पनघट नही बुलाता बसंत ,
बालो में फूल नही लगाता बसंत|
घूरती आँखों से डर जाता है बसंत ,
दु;शासनों से छिप जाता है बसंत |

आजकल डरने लगा है उसका मन
सिर्फ़ तारीखों में नज़र आता है बसंत |
आजकल खेतो में नही जाता बसंत |
इसलिए 'स्प्रिंगफेस्टिवल ' मनाता है बसंत|
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