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वर्ष: 1, अंक 8, फरवरी, 2017



सबके अपने अपने दुःख हैं

प्रताप सिंह

सबके अपने अपने दुःख हैं, सबका अपना रोना है 
सबके अपने अपने सच हैं, अपना पाना खोना है 

समय-साइकिल पर बैठे पैडल मारें दिन-रातों के  
काँधों पर झोला लटकाए रिश्तों औ' जज़्बातों के 

नीति और कर्तव्यों की है रखी हुई सिर पर गठरी 
कभी धूप मुस्कानों की तो कभी आँसुओं की बदरी     

कभी सफ़र यह कठिन बहुत, तो लगता कभी सलोना है 
सबके अपने अपने दुःख हैं, सबका अपना रोना है 

सुलझाते जो एक सिरा तो उलझ दूसरा जाता है 
कच्चे-पक्के धागों से ही, बुना हुआ हर नाता है 

जीवन भर रहते प्रयास-रत, उसे संतुलित करने में 
जाता रीत उमर-घट सारा, चाहों का ऋण भरने में 

पर खाली रह जाता सबके दिल का कोई कोना है 
सबके अपने अपने दुःख हैं, सबका अपना रोना है 

सबकी आँखों में सपने हैं, सबके दिल में आशाएँ 
संकल्पों के घन से खंडित हो सकती हैं बाधाएँ 

किन्तु भ्रमित कर देते मन को, कदम कदम पर चौराहे
भूल भुलैया बन जाती हैं सीधी समतल सी राहें 

आसान नहीं होता धारा में, अचल खड़े होना है 
सबके अपने अपने दुःख हैं, सबका अपना रोना है 

सबको शांति चाहिए लेकिन, अपनी अपनी शर्तों पर 
होठों पर भाईचारा है, कलुष जमा हिय-पर्तों पर
    
सबने पाठ एकता का ही, सीखा बैठ कतारों में
फिर भी बँट जाते हैं सारे, अलग अलग कुछ नारों में  

सबको अपनी ही ऊँचाई का बस स्वप्न सँजोना है  
सबके अपने अपने दुःख हैं, सबका अपना रोना है 

ठेल दूसरे को बस आगे, बढ़ जाने की होड़ लगी 
काँधों पर रख पैर और के, चढ़ जाने की होड़ लगी 

सबको जल्दी जल्दी सब कुछ, दुनिया में पा लेना है 
अपनी नज़रों में सब अच्छे, दोष अन्य को देना है 

सभी भूल जाते- सूरज को, अस्त कहीं तो होना है  
सबके अपने अपने दुःख हैं, सबका अपना रोना है 

जिसको जितना ज्यादा मिलता, उतना ही कम लगता है 
अधिक प्राप्ति की सतत लालसा, में जीवन भर भगता है 

देने का मंतव्य साथ हो, श्रम सार्थक हो जाता है 
दुनिया भर का धन-दौलत,यश, पास सिमटकर आता है 

स्थूल मिटेगा एक दिवस, बस सूक्ष्म जगत में बोना है  
सबके अपने अपने दुःख हैं, सबका अपना रोना है 
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