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वर्ष: 1, अंक 8, फरवरी, 2017



सारी धरा ही आज प्यासी

महेश चन्द्र द्विवेदी

नाभिकीय युद्ध की विभीषिका जब बिहंसेगी
बचूँगा न मैँ, बचेगा न तू, काबा न काशी;
करेगी वह प्रलय की देवी भयंकर अट्टहास
उसकी हंसी मेँ भी भरी होगी अमिट उदासी.

शांत संध्या के सन्नाटे मेँ सागर किनारे
बैठा देख रहा मैँ वारिधि का रूप सन्यासी;
तरंगोँ की गर्जना है थमी और सहमी सी,
तूफाँ से पहले थमी हुई सशंकित हवा सी.

श्रम से थकित हो अवश्य है विश्रामरत
पर इसकी हृदयानल बुझती नहीँ ज़रा सी 
अनभिज्ञ है तू सागर की उच्छृंखलता से 
रात्रि के आते ही हो जायेगा यह विलासी
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