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वर्ष: 1, अंक 8, फरवरी, 2017



प्रभु की माया

जयश्री जाजू

वाह रे! प्रभु कैसी तेरी माया ,
कहीं धूप तो कहीं छाया |
देखो ये कैसा जमाना आया ,
हर जगह झूठ का परचम लहराया |
वाह रे ! 

तूने भी अपना कैसा कमाल दिखाया,
मानव में भर दी केवल माया |
झूठ फरेब से सजी इसकी काया ,
अब न भाए इसको ईमान की माया |
वाह रे !

सच से नहीं रहता इसका वास्ता ,
हर कोई पकड़ता है यही रास्ता |
रिश्ता बन गया इनके लिए सस्ता ,
जीवन की राहे हो चली ही खस्ता |
वाह रे !
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