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वर्ष: 1, अंक 8, फरवरी, 2017



किताब..

हेमंत परिहर

घंटो एक-दूसरे को 
देखते रहते है हम
बिना कुछ कहे ही
सब कहते है हम
वो मुझे पढती है
मैं उसे समझता हुँ
जगह-जगह हमने
एक-दुजे पर यादों के
निशाँ लगा रखे है
कुछ युँ एक दूसरे की
यादें सहेजते है हम
एक साथ ठहरते है
एक साथ चलते है
थक कर कभी कभी
वो मेरे सीने पर ही
सो जाया करती है
मैं उसके लफ्जो की
साँसे सुना करता हुँ
मैं उसकी रात हुँ
वो मेरी महताब है
बडा ही गहरा रिश्ता
मेरा उसके साथ है
वो मेरी एक किताब है
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