Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 1, अंक 8, फरवरी, 2017



तपिश

गुर्रमकोंडा नीरजा

तप रहा है बदन
तप रहा है मन
युग युगों से
तुम्हारी कैद में
सोने के पिंजरे में

बुना तो था प्यार का घोंसला
बन गया जाने कब
बिना दरवाजों का अंधेरा तलघर.

रिश्ते कफन बन गए
घर चिता.

मैं झुलसती रही
इस आग में.

नचाते रहे तुम
नाचती रही मैं.
कभी चाभी के सहारे
कभी चाबुक के साहरे.

बस हो गया
अब नहीं नाचूँगी

मेरी चाभी मुझे दे दो
रोक दो अब तो चाबुक

चाहती हूँ मैं
'मैं' बनकर जिऊँ
सदियों तक.
www.000webhost.com

कृपया अपनी प्रतिक्रिया sahityasudha2016@gmail.com पर भेजें