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वर्ष: 1, अंक 8, फरवरी, 2017



बुराइयों का ढेर

बृजेन्द्र अग्निहोत्री

 मोहनिद्रा में सोया मानव,
नित-नवीन 
अपनी मौलिकता से हाथ धोता.
म्लेच्छ कर्मों में रत होने के बाद भी 
उसके मन में म्लानता नहीं आती.
दूसरे की खुशियों से दुःख, 
दुखो से ख़ुशी 
इनसे उसमें महानता आती,

मानवता का अर्थ, 
स्वार्थपरता से जोड़ 
भर अपने मन में हुलास 
समाज में छोड़, 
बेहिसाब बुराइयों का ढेर 
मानव-मन खुशी से भर जाता.
विचिंतनीय है,
ऐसा मानव, वस्तुतः क्या मानव है?

मानवीय समाज, 
मानव से अलग तो नहीं हो सकता
समाज का निर्माण,
मानव ही है करता 
यदि समाज में- ‘बुराइयों का ढेर’
तो मानव में ...........?
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