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वर्ष: 1, अंक 8, फरवरी, 2017



मुस्कराता जाऊँगा

डॉ०अनिल चड्डा

 
जुनून बढ़ता जायेगा
जितनी मैं ठोकर खाऊँगा
हारना नहीं कभी
दिल को मैं समझाऊँगा

कौन जाने कब मुझे
मिल जाए रास्ता कोई
मोड़ कोई ऐसा मिले
मंजिल पे पहुँच जाऊँगा

राहों में अगर मुझे
काँटों से भी हो सामना
सेज अपने सोने की
काँटों को ही बनाऊंगा

कोई दोस्त या दुश्मन बने
कोई बोल कड़वे भी कहे
दुनिया की बेरुखी को भी
हंस के मैं टाल जाऊँ गा

प्यार की सौगात हो
या दुःख के भी हालात हों
भोर ऐसी आयेगी
नवगीत जब मैं गाऊँ गा

चलना ही है फितरत मेरी
रुकना नहीं आदत मेरी
लाख कोशिशें करो
आगे मैं बढ़ता जाऊँगा

रोने से क्या लाभ है
ये बुझदिलों का काम है
अवसाद के क्षणों में भी
मुस्कराता जाऊँगा
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