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वर्ष: 1, अंक 8, फरवरी, 2017



काश तुम बतला पाते..................

अमरेन्द्र सुमन


काश तुम बतला पाते इतनी विस्तृत दुनिया में इंच भर का व्यास लिये अपने छोटे से शहर की दिनचर्या पढ़ पाते मौसम के मुताबिक उसके बदलते तेवर की आत्मकथा सुन पाते पतली कानों से दुर्गम घाटियों,बर्फीली चोटियों के साथ शहर के उसके छिपे बरामदे पर आयोजित सेमिनार में पढ़ी गई जेहाद की संक्षिप्त रहस्यमयी फुसफुसाहटें यदि तुम महसूस कर सकते उन शरणार्थी चिड़ियों के दर्द को जिनके घोसलों की मीनारों पर बन्दूकें अट्ठास किया करती हैं यदि तुम कर सकते चारों तरफ बिछी वर्फ के काले झुरमुट में रोज-व-रोज हताहतों की लम्बी फेहरिस्त बनाता अपने छोटे से कुख्यात शहर के अलगाववादी रवैयों का भंडाफोड़ यदि तुम जान पाते एक पायजामा के नाड़े में गुँथी दो भाईयों के जीवन की लघुकथा क्या , इतना कुछ जान लेने के बाद तुम लगा लेते अनुमान अपने शहर के जख्म के बाद उसके भविष्य के कार्यक्रम की नियत ? दृश्य सुख के पीछे बना रहा अपने खुद के अस्तित्व को मिटाने गा्रफिक्स प्रिंट दोस्तों ! कितना असहज है वर्तमान परिस्थिति में अपने शहर की मुस्कुराहटों में नन्हीं -नन्हीं कलियों का एक सम्पूर्ण फूल में परिवर्तित होना
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