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वर्ष: 1, अंक 8, फरवरी, 2017



मरा नहीं वो शख़्स कि रोने वाले आ गए

अमिताभ विक्रम


मरा नहीं वो शख़्स कि रोने वाले आ गए, जो जीते जी ना आए मरने पर वो आ गए।
जिनके लिए जोड़ी थी रोटी रात-दिन उसने कभी, एक वक़्त ऐसा भी आया वो ही उसको खा गए।
वो बोलता था कम कुछ अपनों ने गूँगा कर दिया, बस दर्द-ए-दिल बढ़ता गया और प्राण सीने से गए।
याद उसकी आती रहे कि तरकीबें सोची गयी, कुछ अफ़साने याद थे और कुछ भुलाये गए।
कल का सूरज था अब वो अस्त हो गया, आज की सुबह के लिए नए दीप जलाए गए।
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