Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 1, अंक 8, फरवरी, 2017



ज़िन्दगी है तो जीये जा रहे हैं

अमिताभ विक्रम


ज़िन्दगी है तो जीये जा रहे हैं, फटे घावों को सीए जा रहे हैं।
सूरज उगता है पर होती नहीं सुबह, डूबती आँखों से सपने बुने जा रहे हैं।
अब कि जागा तो मैं, मैं ना रहा, आप ज़िस्मों की अदला-बदली किये जा रहे हैं।
हर शख़्स को कोई ना कोई तलब है, हम बिन पीए ही मशहूर हुए जा रहे हैं।
कहते हो कि रात भर रोते रहे, चेहरे फिर क्यों खिले नज़र आ रहे हैं।
www.000webhost.com

कृपया अपनी प्रतिक्रिया sahityasudha2016@gmail.com पर भेजें