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वर्ष: 1, अंक 8, फरवरी, 2017



फिर तुम्हारी याद आई

आचार्य बलवंत


जब गहन निस्तब्धता में दर्द की लौ टिमटिमाई फिर तुम्हारी याद आई। पूछता हूँ कौन आया दर्द को किसने जगाया बात वो किसने चलाई ? फिर तुम्हारी याद आई। सिसकियों में शाम लेकर सुबह का पैगाम लेकर रात जब भी मुस्कुराई। फिर तुम्हारी याद आई।
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