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वर्ष: 1, अंक 8, फरवरी, 2017



बाबा की चौपाल

आचार्य बलवंत


बूढ़ा बरगद देख रहा युग की अंधी चाल। बरसों से सूनी लगती है बाबा की चौपाल। पाँवों की एड़ियाँ फट गईं, बँटवारे में नीम कट गई, कोई खड़ा है मुँह लटकाए, कोई फुलाए गाल। बरसों से सूनी लगती है बाबा की चौपाल। बाँट दी गई माँ की लोरी, मुन्ने की बँट गई कटोरी, भेंट चढ़ गया बँटवारे की पूजावाला थाल। बरसों से सूनी लगती है बाबा की चौपाल। आँगन से रूठा उजियारा, खामोशी ने पाँव पसारा, चहल-पहल अब नहीं रही,सूखी सपनों की डाल। बरसों से सूनी लगती है बाबा की चौपाल।
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