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वर्ष: 1, अंक 8, फरवरी, 2017



खोया हुआ आदमी -


सुशांत सुप्रिय


वह आदमी न जाने कहाँ से भटकता हुआ दूर-दराज़ के उस गाँव में पहुँचा था । गाँव के कुत्तों ने जब चीथड़ों में लिपटे उस आदमी को देखा तो उन्हें वह कोई पागल लगा । वे उस पर बेतहाशा भौंकने लगे । कुत्तों की देखा-देखी गाँव के बच्चे भी पूरी दोपहर उसे छेड़ते और तंग करते रहे । संयोग से किसी बड़े आदमी ने गाँव के बच्चों को उस पर पत्थर फेंकते हुए देख लिया । जब वह उस आदमी के क़रीब गया तो उसके चेहरे पर मौजूद खोएपन के भाव के बावजूद उसे उस आदमी में गरिमा के चिह्न दिखे । यह आदमी पागल नहीं हो सकता -- उसने सोचा । गाँव के उस बड़े व्यक्ति ने उस आदमी से उसका नाम-पता पूछा , पर वह कोई उत्तर नहीं दे सका । वह केवल इतना बोल पाया -- शायद मैं खो गया हूँ ! यह सुनते ही गाँव के उस बड़े व्यक्ति ने निश्चय किया कि वे सब उसे ' खोया हुआ आदमी ' कह कर बुलाएँगे ।

खोया हुआ आदमी इतना खोया था , इतना खोया था कि उसकी पूरी स्मृति का लोप हो चुका था । उसके ज़हन से उसका नाम और पता पूरी तरह खो चुके थे । न उसे अपनी जाति पता थी , न अपना धर्म । लेकिन अपने खोएपन में भी उसमें परिचित-जैसा कुछ था , जो उसे अपना-सा बना रहा था । लिहाज़ा जब उसे गाँव के अन्य लोगों के पास ले जाया गया , तो उसे देखते ही सभी एक स्वर में बोल उठे -- अरे , यह खोया हुआ आदमी तो बेहद अपना-सा लग रहा है । उन्होंने उसे अपने ही गाँव में रख लेने का फ़ैसला किया ।

खोये हुए आदमी की आवाज़ बहुत मधुर थी । कभी-कभी वह अपनी सुरीली आवाज़ में कोई खोया हुआ गीत गाता था तो उस गाँव की गाय-भैंसें जैसे उसके गीत की स्वर-लहरियों से मंत्रमुग्ध हो कर ज़्यादा दूध देने लगतीं । गाँव के बच्चे उसका गीत सुनकर उसकी ओर खिंचे चले आते । गाँव के बड़े-बुज़ुर्गों को भी उसके गीत उनकी युवावस्था के सुंदर अतीत की याद दिलाते । गाँव के लोगों ने पाया कि जब से वह खोया हुआ आदमी वहाँ आया था , गाँव के फूल और सुंदर लगने लगे थे , गाँव की तितलियाँ ज़्यादा मोहक लगने लगी थीं , गाँव के जुगनू ज़्यादा रोशन लगने लगे थे । गाँव के बच्चे भी अब ज़्यादा खुश रहने लगे थे क्योंकि बच्चों को वह सम्मोहित कर देने वाले कमाल के गीत सुनाता था । गाँव के कुत्ते अब उसके सगे हो गए थे । वे उसके आस-पास ऐसे चलते जैसे उसे ' गार्ड ऑफ़ ऑनर ' दे रहे हों ।

उन्हीं दिनों गाँव की एक वृद्धा को सपना आया कि वह खोया हुआ आदमी दरअसल उसका बेटा था जो बचपन में कहीं खो गया था । तब से वह उस खोए हुए आदमी को अपना बेटा मानने लगी । वह एक ग़रीब स्त्री थी जो घास काटकर , उपले थापकर , और पेड़-पौधों की लकड़ियाँ इकट्ठा कर के अपना जीवन चलाती थी । उसने खोए हुए आदमी को अपने सपने के बारे में बताया । खोए हुए आदमी ने ख़ुशी-ख़ुशी उस वृद्धा को अपनी माँ मान लिया , और उसके साथ रहने लगा । उसने अपनी ' माँ ' की इतनी सेवा की कि वृद्धा को लगा कि उसका जीवन धन्य हो गया ।

धीरे-धीरे गाँववालों को खोये हुए आदमी के कई गुणों के बारे में पता चलने लगा । वह पशु-पक्षियों से बातें करता प्रतीत होता । लगता था जैसे वह पशु-पक्षियों की भाषा जानता था । वह आँधी , तूफ़ान , चक्रवात् आने , ओले पड़ने या टिड्डियों के हमले के बारे में गाँववालों को पहले ही आगाह कर देता । उसकी भविष्यवाणी के कारण गाँववाले मुसीबतों से बच जाते । जब एक बार गाँव में सूखे की स्थिति उत्पन्न हो गई तो खोए हुए आदमी ने आकाश की ओर देखकर न जाने किस भाषा में किस देवता से प्रार्थना की । कुछ ही समय बाद गाँव में मूसलाधार बारिश होने लगी । सूखी मिट्टी तृप्त हो गई और बच्चे-बड़े सभी इस झमाझम बारिश में भीगने का भरपूर आनंद लेने लगे । उस दिन से खोया हुआ आदमी गाँव में सबका चहेता हो गया ।

गाँव के किनारे कुछ घर दलितों के थे और कुछ मुसलमानों के । गाँव की ऊँची जाति के लोग उनसे अलग रहते थे । खोए हुए आदमी ने दलितों और मुसलमानों से भी मित्रता कर ली । वह रोज़मर्रा के कामों में उनकी मदद कर देता । उन्हें उनके अधिकारों के बारे में बताता । देखते-ही-देखते गाँव के दलित अपने हक़ की माँग करने लगे । उधर गाँव के बड़े-बूढ़ों पर भी खोए हुए आदमी के समझाने का असर हुआ । धीरे-धीरे दलितों का शोषण बंद हो गया । आपसी भाईचारा बढ़ने लगा । गाँव के दलितों और मुसलमानों के प्रति ऊँची जातियों के लोगों का व्यवहार सुधरने लगा । गाँव के दलितों को गाँव के कुएँ से पानी लेने की सुविधा मिल गई । उन्हें गाँव के मंदिर में प्रवेश करने का अधिकार मिल गया । गाँव के हिंदू और मुसलमान मिल जुल कर ईद और होली-दीवाली मनाने लगे । इस तरह गाँव में साम्प्रदायिकता और जातिवाद को दूर करने में खोए हुए आदमी ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई ।

उसके आने से गाँव में एक और बदलाव आया । गाँव में स्त्रियों की दशा ठीक नहीं थी । खोए हुए आदमी ने स्त्रियों को अपने अधिकारों के लिए लड़ना सिखाया । गाँव की सभी स्त्रियाँ पुरुषों की ज़्यादतियों के ख़िलाफ़ एकजुट हो गईं । खोए हुए आदमी के समझाने का असर भी हुआ । धीरे-धीरे स्त्रियों के विरुद्ध अत्याचार समाप्त हो गया । उन्हें भी सम्मान मिलने लगा ।

इस गाँव से क़रीबी क़स्बे की दूरी तीन दिन की थी । गाँव में खेती की ज़मीन तो थी पर कभी बीज नहीं मिलता , कभी खाद नहीं मिलता । खोए हुए आदमी ने गाँववालों को प्रेरित किया कि वे गाँव में ही अच्छे बीज और जैविक खाद की दुकान खोल लें । वह खुद लोगों के खेत में मेहनत करता , खेती-बाड़ी में उनकी मदद करता ।

लगता जैसे उसके हाथों में जादू था । उसकी मदद गाँववालों के लिए ख़ुशहाली ले आई । गाँव का तालाब मछलियों से भर गया । गाँव में उगे फलों के पेड़ फलों से लद गए । खेतों में फ़सलें लहलहाने लगीं । मौसम अच्छा बना रहा । गाँव वालों ने इन सब का श्रेय खोए हुए आदमी को दिया । उन्हें लगा जैसे उसकी मौजूदगी में बरकत थी । धीरे-धीरे वह पूरे इलाक़े में लोकप्रिय हो गया । पड़ोस के अन्य गाँवों के लोग भी उसके मुरीद बन गए ।

शुरू-शुरू में कुछ लोग उसे प्रश्नवाचक निगाहों से देखते थे । पर खोए हुए आदमी का चेहरा इतना विश्वसनीय था और उसका व्यवहार इतना सरल और सहज था कि धीरे-धीरे उसके आलोचक भी उसके प्रशंसकों में बदल गए । लोगों को लगता था कि उसके पास कोई जादुई शक्ति थी जिससे वह आसानी से समस्याओं के हल ढूँढ़ लेता था । हालाँकि खोए हुए आदमी ने हमेशा इस बात का खंडन किया ।

वह लोगों से कहता -- " आप सब के पास भी वही शक्तियाँ हैं । खुद को पहचानो ।

अपनी ऊर्जा को रचनात्मक और सकारात्मक कामों में लगाओ । जुड़ो और जोड़ो । "

इस तरह खोए हुए आदमी ने इलाक़े के लोगों में नया विश्वास भर दिया । लोगों में नया जोश , नया उत्साह आ गया ।

पर अंत में वह दिन भी आ पहुँचा । एक रात मौसम बेहद ख़राब हो गया । बादलों की भीषण गड़गड़ाहट के साथ पूरे आकाश में बिजली कड़कने लगी । तभी कई सूर्यों के चौंधिया देने वाले प्रकाश ने रात में दिन का भ्रम उत्पन्न कर दिया ।

फिर वज्रपात जैसी भयावह गड़गड़ाहट के साथ गाँव में कहीं बिजली गिरी । लोग अपनी साँसों की धुकधुकी के बीच अपने-अपने घरों में दुबके हुए थे । सारी रात मौसम बौराया रहा । लोगों का कहना है कि उस रात गंधक की तेज़ गंध पूरे गाँव में फैल गई थी , और मकानों की खिड़कियों-दरवाज़ों की झिर्रियों में से घुस कर यह तीखी गंध सभी घरों में समा गई थी ।

सुबह जब मौसम साफ़ हुआ तब गाँववालों ने पाया कि वह खोया हुआ आदमी अब उनके बीच नहीं था । वह ग़ायब हो चुका था । गाँववालों ने उसे बहुत ढूँढ़ा पर उसका कोई पता नहीं चला । न जाने उसे ज़मीन निगल गई थी या आसमान खा गया था। उसकी तलाश में आसपास के गाँवों में गए सभी लोग ख़ाली हाथ वापस लौट आए । गाँव की गलियाँ उसके बिना सूनी लगीं । पशु-पक्षी उसके बिना उदास लगे । गाँव के बच्चे उसके बिना बेचैन लगे । गाँव के कुत्तों की आँखों में भी आँसू थे ।

दुखी गाँववालों ने खोए हुए आदमी की याद में उसकी एक मूर्ति बना कर गाँव के बीचोंबीच स्थापित कर दी । पंचायत की सभी बैठकें अब इसी मूर्ति के पास हुआ करतीं । गाँववालों ने प्रण लिया कि वे उस खोए हुए आदमी के दिखाए मार्ग पर चलेंगे । आज भी यदि आप उस गाँव में जाएँगे , तो आपको उस खोए हुए आदमी की वहाँ स्थापित मूर्ति दिख जाएगी ।

लेकिन अापको असली बात बताना तो मैं भूल ही गया । खोए हुए आदमी के ग़ायब होने के कुछ समय बाद जब जनगणना अधिकारी सेंसस के काम से इस गाँव में पहुँचे , तो वे यह देख कर हैरान रह गए कि गाँव में किसी को भी न तो अपनी जाति याद थी , न अपना धर्म याद था । धर्म और जाति के बारे में उनकी स्मृतियाँ उस खोए हुए आदमी के साथ ही जैसे सदा के लिए खो चुकी थीं । काश , अपने शहर में हमें भी ऐसा खोया हुआ आदमी मिल जाता ...

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