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वर्ष: 1, अंक 8, फरवरी, 2017



जीतने संसार निकले...

राजेन्द्र वर्मा

जीतने संसार निकले, हार कर वे आ गये,
विश्वव्यापी अर्थ अंगीकार कर वे आ गये।
 
अर्थ के विद्रूप की आलोचना तो ख़ूब की,
पर स्वयं विद्रूपता स्वीकार कर वे आ गये।
 
थे बहुत वाचाल, पर परिणाम कुछ निकला नहीं,
दुष्ट की मैत्री पे सब कुछ वार कर वे आ गये।
 
स्वार्थसाधक-शोषकों-खलनायकों के इष्टगण,
भक्तगण के हेतु खादी धार कर वे आ गये।
 
कामना थी, उनसे वे संवाद जी भर कर सकें,
बात हो पायी न कुछ, मन मार कर वे आ गये।
 
स्वर्ण-पंछी के लिए सैलानियों के वेश में 
जो लुटेरे थे, समुन्दर पार कर वे आ गये।
 
ब्रह्मवेत्ता धारकर संन्यास निकले तीर्थ पर,
किन्तु जब लौटे, सकल संसार कर वे आ गये।
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