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वर्ष: 1, अंक 8, फरवरी, 2017



अमीरी मेरे घर आकर...

राजेन्द्र वर्मा

अमीरी मेरे घर आकर मुझे आँखें दिखाती है,
ग़रीबी मुस्कुराकर मेरे बर्तन माँज जाती है।
 
भले ही सूर्य बन्दी हो गया अट्टालिकाओं में,
अँधेरो! किन्तु मेरे घर अभी भी दीप-बाती है।
 
अतिथि-सत्कार करने में मेरी हालत हुई पतली,
पर उसके मुख पे रत्ती-भर नहीं संतुष्टि आती है।
 
चला है जब से मोबाइल, फ़कत बातें-ही-बातें हैं,
न आना है, न जाना है; न चिट्ठी है, न पाती है।
 
विपर्यय ने मेरे घर का किया है अधिग्रहण ऐसे,
विभा आती है लेकिन, उल्टे-पैरों लौट जाती है।
 
दुखों से दाँत-काटी दोस्ती मेरी हुई जब से,
कि सुख आये न आये, जि़न्दगी उत्सव मनाती है।
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