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वर्ष: 1, अंक 8, फरवरी, 2017



आदमी ख़ुश हो रहा...

राजेन्द्र वर्मा

आदमी ख़ुश हो रहा घर में उजाला देखकर,
तम भी ख़ुश, दीपक-तले अपना ठिकाना देखकर।
 
प्रेम के सन्दर्भ में क्या पाप है, क्या पुण्य है?
मति फिरी श्वेतांक की भी चित्रलेखा देखकर।
 
जब से कंक्रीटों के वन में बोनसाई है उगी,
फँस गये पिंजरे में पंछी आबोदाना देखकर।
 
न्याय की देवी ने आँखें बाँध लीं, अच्छा हुआ,
बिक रही है न्याय की कुर्सी भी पैसा देखकर।
 
जनवरी की खिल गयीं बाँछें हमेशा की तरह,
पूस के टट्टू चढ़ा नववर्ष आया देखकर।
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