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वर्ष: 1, अंक 8, फरवरी, 2017



फूलों की मानिंद हम तो खिले हैं

डॉ०अनिल चड्डा


फूलों की मानिंद हम तो खिले हैं, गले खारों के हम जब जब मिले हैं। ठोकरों से हमको डराओ न यारों, पत्थरों के दरम्यान हम तो पले हैं। आसमां भी उनके लिए ऊँचा नहीं है, लग कर जमीं से जो भी चले हैं। मुश्किलों के दरम्यां जो रहते सदा हों, उन्ही के लिये राहों के सिलसिले हैं। ‘अनिल’ की कलम न रुकेगी कभी भी, होंठ लेकिन उसके कब के सिले हैं।
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