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वर्ष: 1, अंक 8, फरवरी, 2017



कुछ दोहे

प्रताप सिंह

देश बना बाज़ार अब, चारो ओर दुकान
राशन है मँहगा यहाँ, सस्ता है ईमान 

राजा- रानी तो गए, गया न उनका मंत्र 
मतपेटी तक ही सदा, रहा प्रजा का तंत्र 

सर्वाहारी क्यों इसे, बना दिया भगवान ? 
ज़र,जमीन,पशु-खाद्य तक, खा जाता इंसान 

गंगाएँ कितनी बहीं, 'बुधिया' रहा अतृप्त
जब जब है सूखा पड़ा, नेता सारे तृप्त 

बापू , तुम लटके रहो, दीवारों को थाम
नमन तुम्हें कर नित्य हम, करते 'अपना काम'

रंग मंच पर नग्नता, नाचे भर हुंकार 
छुपकर अब नेपथ्य में, सिसक रहा है प्यार

हाथों में बारूद है,  मन में है अंगार 
आने वाली नस्ल को , दोगे ये उपहार ?

रुका नहीं  जो अतिक्रमण, धरती देगी शाप  
धिक्कारेंगी पीढ़ियाँ, रूह उठेगी काँप    

गरजें पर बरसें नहीं, सिर्फ जगाएँ आस 
ये चुनाव मेघ हैं, इनका क्या विश्वास 

ताकत तो है तोडती, पिघलाता है प्यार  
लोहा जब पिघले तभी, ले नूतन अाकार

परिवर्तन शाश्वत रहा, कोई भी हो दौर
पर विरोध भी साथ मे, होता है पुरजोर    

जो माटी से तन बना, महता कम ना होत
बिन दीया कैसे भला, जलती कोई जोत
मिलन विरह दोनों सुखद, प्रेम करे यदि वास
कस्तूरी सा, हृदय में, फैले मधुर सुवास

सुलगे भुस तो देर तक, धुँआ भरे आकास
तिनका जलता एक पल, देता  अग्नि, उजास

मसिहा बनने की रही, सदा मनुज की चाह
पर सबसे बनती नहीं, पानी ऊपर राह

रात दिवस लड़ता, मगर, पार कभी ना पाय
चक्रव्यूह गढ़ आप  ही, ढूँढे  स्वयं उपाय

आधिपत्य, प्रतिदान, गुण, होते नहि आधार
इसीलिए  सबसे अलग, होता माँ का प्यार
 
मृत्यु भले ही जगत में, सबका अंतिम सत्य
मरण  नहीं जीवन बिना, जीवन पहला  सत्य

प्रीति हिया ऐसी जगी, भागा भेद-विवेक
हर अमूर्त औ' मूर्त में,  रुप दृष्टिगत एक  

रामायण, गीता तुम्ही, तुम ही वेद, पुराण  
पढूँ, गुनूँ  आठो पहर,   तुममें  ही निर्वाण

नेह-सुधा की अब्धि तुम, सुख-माणिक भण्डार
डूब डूब चुनता रहूँ,  भरूँ हृदय आगार

सुबह, तुम्हारी ही हँसी, दुपहर, मधुरी बैन
साँझ तुम्हारी प्रीति है, आलिंगन है रैन
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