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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



रामायण के अनछुये पहलू


डाॅ. कौशल किशोर श्रीवास्तव


प्रस्तावना

महर्षि वाल्मिकि ने श्री नारद से कहा कि वह एक महाकाव्य लिखना चाह रहे हैं अतः कृप्या समकालीन आदर्श पुरूष का नाम बतला दें जिन पर महाकाव्य लिखा जा सके।

श्री नारद ने जवाब दिया कि इस समय भगवान राम ही पूर्ण आदर्श पुरूष है। किंवा श्री हरि के अवतार हैं। उनकी जीवनी पर आप महाकाव्य लिखें। इस तरह रामायण का जन्म हुआ।

रामायण केवल महाकाव्य ही नहीं बल्कि उसमें कपिल का सांख्य, औपनिषिदिक उपमायें, श्री मद्भागवन चरित्र की कमजोरियां, राजनीति शास्त्र, समाज शास्त्र, नीतिशास्त्र, परिवार के आपसी सम्बंध, प्रतिबद्धतायें, महल और वन के दो ध्रुव, चरित्रों के असीम अंतरिक्ष तात्कालिक संस्कृति, इतिहास, समकालीन भूगोल इत्यादि। कल्पना में स्थान पाने वाले सभी तथ्य एवं कल्पनातीत कल्पनायें एक साथ मिलते हैं।

यहां यह तथ्य उल्लेखनीय है कि जहां महर्षि वाल्मीकि ने मूल रामायण की रचना देवर्षि नारद की प्रेरणा से की वहीं महात्मा तुलसीदास ने रामचरित मानस में वह आधार लिया है जिसकी रचना भगवान शंकर ने की है।

जागवलिक जो कथा सुहाई।
भरद्वाज मुनि वरहिं सुनाई।।
कहिहऊं सोई संवाद बखानी।
सुनहुं सकल सज्जन सुख मानी।।
सम कीन्ह यह चरित सुहावा।
वहुरि कृपा करि उमहि सुनावा।।
सोई सिव काकभुसुऽहि दीन्हा।
रामभगत अधिकारी चीन्हा।।
तेहि सन जाग वलकि पुनि पावा।
ते श्रोता वक्ता सम सीला।
संव दरसि जानहि हरि लीला।।


दशरथ

दशरथ का तात्पर्य दस इन्द्रियांे वाले सघात एवं मन का समुच्चय है। जैसा कि कठोपनिषद में कहा गया हैः

ऋत पिवन्तो सुकृतस्य लोक, गुहां प्रविवटो परमे पराधे।
छाया तथो ब्रह्म विदो वदन्ति, पंचाग्नयो ये च त्रिणाचि केता।।

इस देह में सुकृत का अवश्य मिलने वाला, फल चखने वाले दोनों (अर्थात जीवात्मा एवं परमात्मा) हृदय रूपी गुहा में रहते हैं। इसे ब्रह्म वेत्ता एवं पंचाग्नि की त्रिकाल उपासना करने वाले कहते हैं।

जीवात्मा द्वारा मन, वचन या कर्म से जो भी कार्य किया जाता है उसका प्रभाव चित्त पर पड़ता है। उसी को संस्कार कहते हैं। ये सारी माया चेतिसिक है। माया में ‘मा’ का अर्थ है ‘नही’ और ‘या’ का अर्थ है जो। यानि जिसका अस्तित्व नहीं है पर जो होती हुई प्रतीत होती है। माया का अस्तित्व चित्त में ही रहता है। चित्त को अव्यक्त कहते हैं। वह दृष्टि में नहीं रहता है। जो हम देखते हैं वह कर्म फल है। शरीर कर्मफल है एवं परिणाम कर्मफल है। चित्त से कार्य नहीं पर फल चिपकता है।

दशरथ नें श्रवण कुमार को मारा था। यह दुर्घटना अंजानें में हुई थी पर उसका कर्म फल तात्कालिक समय में उस जीव से चिपक गया। वही जीव दशरथ के रूप में अवतरित हुआ। एक संघात कई कर्म फलों से बनता है। चित्त एक बहाव है जो अनेक जन्मों के संस्कारों सहित बहता चला आ रहा है। ये आंखे, कान, त्वचा, जिव्हा, नाक, पूर्वकृत अलग-अलग कार्यों के परिणाम हैं। समय के बहाव में अलग-अलग कर्म फल प्रकट होते हैं एवं सुख या दुख देकर बुझ जाते हैं। इस बहते हुये चित्त की मृत्यु नहीं होती। बस भुगतता रहता है और करणों से (नेत्र, कर्ण, रसना, त्वचा घ्राण, दोनों हाथ, दोनों पैर, वाणी, गुदा और उपस्थ) कार्य करता हुआ और भुगतता हुआ बहता रहता है। अतः मुक्ति के लिये इच्छाओं का दमन करते रहना है जन्म जन्मान्तरों तक साथ ही विगत कर्मों का परिणाम भुगतते रहना है।

जो हम महसूस करते हैं वह हो चुका है भगवान महावीर ने कहा है कि जो हो रहा है वह हो चुका है समझो। इसीलिये श्रीमद्भगवत् गीता के ग्यारहवें अध्याय में भगवान अर्जुन से कहते हैं कि सारे योद्धा पहले ही मारे जा चुके हैं। हे अर्जुन, तुम निमित्त मात्र बन जाओ।

इस तथ्य को इस तरह भी समझ सकते हैं कि जो सूर्य की रोशनी हम आज देखते हैं वह सात मिनिट पहले चल चुकी है। अतः हम सात मिनिट पहले का सूर्य देखते हैं। या जिन तारों का प्रकाश कई अरब वर्ष पहले चला था वह हम आज देखते हैं। हो सकता है वह कई अरब वर्ष पहले समाप्त हो। यानि हमारी इन्द्रियां वही देखती हैं जो हो चुका है उसी को हम वर्तमान कहते हैं।

अतः श्रीमान दशरथ ने जो पुत्र वियोग भगवान राम के वन गमन के समय सहा वह पहले ही लिखा जा चुका था। श्रवण कुमार के पिता उन्हें श्राप न भी देते तब भी उन्हंे मरनात्तक पुत्र वियोग सहना पड़ता। तब क्या दशरथ पूर्व भव में श्रवण कुमार को न मारने के लिये स्वतंत्र थे। वह श्रवण कुमार और उनके माता पिता के भी पूर्व जन्मों का परिणाम था। क्या यह कर्म और कर्म फल की श्रंखला अनवरत् है?

इसीलिये मस्करी घोशाल कहा करते थेः माकृत, माकृत। उनके अनुसार मत करो, मत करो।

कर्म फल विधि का विधान है और भगवान को भी भुगतना पड़ता है। कौरवों और पाण्डवों में युद्ध हुआ। पाण्डव उनके कर्मों के फल को भगवान को समर्पित करते रहे। अतः जब पाण्डवों ने कौरवों के कुल का नाश किया तो कर्म-फल स्वरूप उनके कुल का नाश नहीं हुआ पर भगवान को उनका कर्म फल लेना पड़ा और वृष्णिवंशियों का नाश हो गया। भगवान कृष्ण ने पहली बार बतलाया कि कर्म और फल की ग्रंथि को तोड़ा भी जा सकता है। यह कर्म योग दशरथ को नहीं मालूम था।

पहले कहा जा चुका है कि दशरथ यानि शरीर। राम परमात्मा है। जब तक आत्मा शरीर के साथ रहती है तभी तक व्यक्ति जिंदा रह सकता है। जब भगवान ने वन को प्रस्थान किया तो दशरथ की मृत्यु हो गई।

आप कह सकते हैं कि भगवान ने जब तक दशरथ के घर जन्म नहीं लिया था तब तक दशरथ जीवित रहे।

तब तक भगवान कारण के रूप में दशरथ के साथ थे। कहा जा चुका है कि कार्य का पूर्व अस्तित्व कारण है। जब कारण कार्य रूप में परिवर्तित हो जाता है तब बुझ जाता है। कार्य आने वाले समय का कारण बन जाता है पर उसका रूप परिवर्तन हो जाता है।

लकड़ी में आग कारण रूप में उपस्थित रहती है पर जब आग लग जाती है तब वह राख बन जाती है जलने पर लकड़ी राख एवं कार्बन डाइआक्साइड के रूप में रहती है।

कौशल्या

नारी को प्रकृति कहा गया है। प्रकृति यानि पूर्व-कृति। प्रकृति के तीन गुण होते हैंः सत्व, रज और तम। सत्व से ज्ञान उत्पन्न होता है, सारे द्वारों (इंन्द्रियों) से प्रकाश उत्पन्न होता है और वह हमें सत्कर्म में लगाता है।

तत्र सत्वं निर्मलत्वात्प्रकाशक नायमम्।
सुख संगेन वध्नानि ज्ञान संगेन चानध।
सर्व द्वारेशु देहेऽस्मिन प्रकाश उपजायेते।
ज्ञानं यक्ष तदा विद्याद्ववृद्धं सत्वमित्युत।
-श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 14, श्लोक 13 एवं 14।

वहां सत्व निर्मल होने के कारण, भास मय है पवित्र है वह सुख एवं ज्ञान के साथ लिप्त करता है। जब इस शरीर की समस्त इन्द्रियांे में चेतना एवं ज्ञान जाग्रत होता है तब सत्व गुण उत्पन्न हुआ है ऐसा कहते हैं। माँ कौशल्या स्वयं ज्ञानमय, निश्छल एवं निर्मल थीं।

माँ कौशल्या सत्व गुण की प्रतीक हैं। उनके माध्यम से भगवान राम प्रकट हुये। भगवान स्वयं ज्ञानमय हैं।

मे मतभ आस्थितः स युक्तात्मा मामेवामनुत्तमां गति चतुर्विद्या भजन्ते।
माम जनाः सुकृतिनोऽर्जुन आर्ती जिज्ञासुर्थाथी ज्ञानी च भरतशम।।
तेशां ज्ञानी नित्य युक्त भक्ति विषिष्यते प्रियोहि हि ज्ञानीनोऽत्यर्थ ।
स च मम प्रिय। उदाराः सर्व सर्वते ज्ञानीत्वात्मैव मे।।

यहां यह ध्यान देने योग्य बात है कि भगवान जन्म नहीं लेते पर प्रकट होते हैं। तुलसीकृत राम चरित मानस में कहा भी है ‘‘भय प्रकट कृपाला दीन दयाला कौशल्या हितकारी।’’

क्या भगवान केवल कौशल्या हितकारी थे। नहीं। यह कौशल्या के दृष्टिकोण से देखा गया है। यहां कौशल का अर्थ योगी है क्योंकि गीताजी में भगवान ने कहा है कि योगः कर्मसु कौशलम् ।

अतः कौशल्या हितकारी का तात्पर्य हुआ भक्तों का प्रिय करने वाले।

भगवान विष्णु चतुर्भुज हैं अतः उनके अवतार भी चतुर्भुज होते हैंः

लेचन अभिरामा तुन घनश्यामा निज आयुध भुज चारी।

भगवान कृष्ण भी चतुर्भुज थे श्रीमद्भगवद गीता के ग्यारहवें अध्याय में अर्जुन उनसे चतुर्भुज रूप में ही पुनः प्रकट होने को कहते हैं।

किरीटनं सदिनं चक्रं हस्तमिच्छानि त्वां द्रवटुमहे तथैव।
तनैव रूपेण चतुर्भुजन सहस्त्रबाहु भव विश्वमूर्ते।।

श्रीमति कौशल्या धैर्यवान, श्रद्धामयी एवं ज्ञानवान थीं। जब भगवान वन गमन को उनकी आज्ञा लेने गये तब उन्होनें श्री राम को प्रबोध किया।

अकेले पिता ने जाने की आज्ञा दी है तब वन गमन की आवश्यकता नहीं है पर यदि माँ की भी आज्ञा है तो तुम्हें वन अवश्य जाना चाहिये।

कैकई

कैकई रजो गुण की प्रतीक है। वह बहादुर महिला है। जब दशरथ देवों के पक्ष से दानवों से लड़ रहे थे तब दशरथ के रथ के पहिये की धुरी की कील निकल गई थी। तब कैकई ने स्वयं की उंगली धुरी की कील की जगह फंसा दी थी जिससे की दशरथ के रथ का पहिया न निकल जाये। कैकई दशरथ के साथ युद्ध में भाग लेने के लिये जाती थी।।

उस समय दशरथ ने कैकई से दो ‘वर’ मांगने को कहा था तब कैकई ने किसी और समय में ‘वर’ लेने को कहा था।

श्रीमद भगवत गीता में रजो गुण की निम्न पहचानें बतलाई गई हैंः

रजो रागात्मक विृद्धि तृष्णासंग समुद्धंव।
तन्निवहनाति कौन्तेय कर्मसंगेन देहिनम्।
लाभः प्रवृत्तिराम्भः कर्मणाषमः स्पृहां।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्शभ।

कैकई में राग था कर्मणांम अषम् सप्तहा थी। इसीलिये उन्होनें दशरथ से श्रीराम के युवराज पद पर आरूढ़ होते समय ये अप्रत्याशित वर दशरथ से मांग लिये। रजो गुण को विकर्म भी कहा गया है। श्री मदभगवत गीता में भगवान ने कहा हैः-

कर्मणोऽपि बोद्धव्यं बोधव्यं च विकर्मणाः
अकर्माणपि केदृव्यं गहणां कर्मनो गति।।

कर्म को जानना चाहिये विकर्म को भी जानना चाहिये, अकर्म को भी जानना चाहिये। कर्म की गति गहना हे।

विकर्म में कत्र्ता कर्म के स्वरूप को नहीं जान पाता, न ही उसके परिणामों कों। कैकई ने जब ‘वर’ मांगे तब उसको मालूम नहीं था कि सही कर्म क्या है और गलत कर्म क्या है। न ही उसके परिणामों को जानता है। कैकई ने जो ‘वर’ मांगे थे उनमें परमार्थ नहीं था स्वार्थ था। परमार्थ तो भगवान ही हैं।

सुमित्रा

सुमित्रा तमों गुण की प्रतीक या मुक्ति थी। यहां प्रतीक ही कहा गया है। यूं तो भगवान शंकर को भी विचारक तमोगुण का प्रतीक मानते हैं वे भगवान विष्णु को सत्वगुण, ब्रह्मा को रजोगुण एवं भगवान शंकर को तमोगुण का प्रतीक मानते हैं। पर भगवान के सभी गुण सात्विक होते हैं।

सुमित्रा की कोई इच्छा नहीं थी। वे समय के बहाव के साथ बहती थीं।शत्रुघ्न ने कहा कि वे भरत के साथ रहेंगे तो उन्होनें आज्ञा दे दी, लक्ष्मण ने कहा कि वे भगवान राम के साथ रहेंगे तो आज्ञा दे दी। पर ये गुण सत्व गुण भी हैं।

गुणानेतानतील्य त्रीन्देही देह समुद्रभवान।
जन्म मृत्यु जरा दुःखैविमुक्तोऽमृतष्नुते। (अध्याय 14, श्लोक 20)
उदासीन वदासीनो गुणेर्यो न विचाव्यते।
गुणा वर्तन्त्येव यो अवतिष्ठिन्ति नेगंते। (अध्याय 14,श्लोक 23)
सम दुःख सुखः स्वस्थः सम लोष्ठाष्य कांचन।
तुल्र्याप्रयाप्रियो धीरस्तुल्य निन्दात्म्स्तुति। (अध्याय 14, श्लोक 24)


माता सीता: प्रकृति स्वयं।

माता सीता धरती माँ से प्रकट हुई थी, धरती स्वयं प्रकृति की प्रतीक मानी जाती हैं। प्रकृति को परमात्मा की सहचरी कहा गया है। भगवान स्वयं प्रकृति के अभाव में स्वयं को प्रकट नहीं कर पाते क्योंकि भगवान तो निर्गुण, निराकार, निष्पक्ष, अज, परम, अव्यक्त हैं। प्रकृति और पुरूष दोनों ही शाश्वत हैं।

प्रकृति जब तक पुरूष के साथ रहती है तब तक सुरक्षित रहती है पर जब उसमें इच्छा जाग्रत होती है तब द्वैत भाव जाग्रत हो जात है। यह द्वैत प्रकृति को पुरूष से अलग कर देता है। तब वह तामसी प्रवृत्तियों के द्वारा अपहरण की ली जाती है। कामना में व्यवधान पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से बुद्धि का नाश हो जाता है। बुद्धि के नाश होने से रजो गुण से तमो गुण में धकेल दिया जाता है।

सत्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः।
निवध्नन्ति महावाहो देहे देहिनमव्ययम्। (अध्याय 14,श्लोक 5)
मम् योनिः यहद् ब्रह्य तस्मिन् गर्भ दधाम्यहं।

अब जरा सीता जी द्वारा स्वर्ण मृग की कामना वाले प्रकरण का उपरोक्त परिप्रेक्ष्य में अध्ययन कर लिया जाये।

सीता जी ने स्वर्ण मृग देखा। सोने का जीवित मृग असंभव है, पर सीता जी की उस मृग के लिये तीव्र कामना जागी। उन्होनंे भगवान राम को वह मृग लाने के लिये विवश किया।

भगवान राम मृग लेने के लिये चल दिये। यहां प्रकृति पुरूष से अलग हो गई। जब मारीच ने मरते समय हे राम कहा तो सीता जी ने लक्ष्मण जी को भगवान राम की सुरक्षा हेतु जाने के लिये कहा। लक्ष्मण जी को मालूम था कि अखिल ब्रह्मण्ड में भी भगवान राम का कोई भी प्राणी अहित नहीं कर सकता। तब सीता जी में क्रोध जागृत हो गया। जब लक्ष्मण जी ने सीता जी को बतलाया कि भगवान राम परम पुरूष हैं और अजेय हैं तब सीता जी ने विवेक खो दिया और सुत जैसे देवर पर स्वयं पर अनुस्क्त होने का आरोप लगा दिया यह बुद्धि नाश का उदाहरण है। तब भी लक्ष्मण आश्रम के चारों और रक्षा वलय खींच कर चले गये। उन्होनें माँ सीता को निर्देश दिया कि वे वह रक्षा वलय पार न करें। पर सीता जी का विवेक नष्ट हो गया था। उसी समय रावण साधु का रूप रख कर उनसे भिक्षा मांगने आ गया।

श्री सीता जी ने देवर का कहना नहीं माना पर एक अंजान व्यक्ति का कहना उसके बहकावे में आकर मान लिया और उनका तामसी वृत्ति ने अपहरण कर लिया।

दरअसल इच्छायें हमें स्वभाव से नीचे गिरा देती हैं फिर हमें ऊपर उठ कर अपने आप तक आने में काफी चैतसिक शक्ति लगाना पड़ती है। पर हमारा ध्येय मात्र स्व-भाव में स्थित रहना नहीं है पर परमात्मा भाव तक जाना है। एक बार भगवान सांई बाबा से किसी ने पूछा ‘‘कहाँ जायें? उन्होनंें कहा ‘‘ऊपर जाओ’’ फिर प्रश्न हुआ ‘‘कैसे जायें?’’ बाबा ने जवाब दिया ‘‘एक मार्ग तो मुझसे होकर जाता है।’’

सीता माता फिर अशोक वाटिका में राम नाम ही लेती रहीं। नाम हमें ऊपर उठा देता है। नाम कोइ्र भी हो। उसके साथ जो श्रद्धा होती है वह हमें परमात्मा से मिला देती है। परमात्मा भी एक भाव है। हम सब श्रद्धा मय हैं। श्री मद्भगवद गीता में कहा हैः

श्रद्धामयोऽयं पुरूषः यो यच्छद्रः स एव स।

काम, क्रोध एवं लोभ हमें चेतना के स्तर में नीचे गिरा देते हैं। जिसे हम महसूस कर सकते हैं। जो हमारी पकड़़ में आये वह हमारा स्वरूप नहीं है। हम इन्द्रियों से (मन सहित) विषयों को पकड़ लेते हैं। वे हमारा स्वरूप नहीं है।

जब माता सीता अनन्य भाव से राम को भजतीं रहीं तब उनके अंदर राम तत्व शक्तिशाली होता गया इससे रावण उनके द्वारा अपशब्द सुनने पर भी उन्हें छू तक ना सका।

पतंजलि योग का प्रथम सूत्र है: योंगश्चित्त वृत्ति निरोध।

चित्त के व्यापार का निरोध ही योग है। चित्त की वृत्तियां अनन्त होती हैं। वह यहां वहां घूमता ही रहता है। उसे एक बिन्दु पर केन्द्रित करना ही योग है। नाम का जप करना ही एक सरल उपाय है। वैसे श्रीमद्भगवद गीता का हर अध्याय एक योग है। यहां तक कि पहला अध्याय भी जिसे विशदयोग का नाम दिया गया है, क्योंकि अर्जुन एक धु्रवी होकर विशाद में डूबा था।

रावण

रावण को दशानन कहते हैं। आनन यानि मंुह। मुंह से खाना खाया जाता है। माण्डूक्य उपनिषद में प्राणी के इक्कीस मुंह बतलाये गये हैं। जिन्होनें इन्द्रियों को केवल मुंह समझ रखा है और उनसे विषयों का सेवन करते रहते हैं वे सब दशानन हैं वे दस मुंह हैंः दो नेत्र, दो कर्ण, दो नासिकायें, रसना, त्वचा, गुदा और उपस्थ। इनके विषयों का सेवन मन लगातार करता रहता है। यह विषय सेवन, सुख नहीं देता, रूलाता है इस तरह हरेक सामान्य प्राणी दशानन और रावण है।

रावण के परिवार के हरेक सदस्य का नाम शरीर के अंगों या गुणों पर आधारित है। जैसे कुम्भकर्ण, मन्दोदरी (जीणोक्षर, क्षीण उदर वाली) सूर्प नखा, सुलोचना, मेघनाद,विभीषण आदि। यह केवल संयोग नहीं है।

रावण में काम वासना, नफरत अभिमान के सिवा कुछ नहीं था। जब कोई व्यक्ति तप करता है तो ऊपर उठता है पर लोभ या कामनायें भी ऊपर उठतीं है। तप का उल्टा ‘पत’ है। इस धातु का मतलब गिरना होता है। अध्याय में अर्जुन ने भगवान से पूछा:

अथ केन प्रयुक्तोऽयं पप्पं चरति पुरूषः
अनिछदनपित वाष्र्णेय बलादिव नियोजितः।

यानि हे कृष्ण। किसके द्वारा पे्ररित होकर न चाहते हुये भी, मानों वलात् यह पुरूष पाप में विचरण करता है।

भगवान ने जवाब दिया:

काम एष क्रोध एष रजोगुण समुद्भवः।
महाराना महापाप्भां विद्येनमिह वैरिणः।।

यह अत्यधिक भूखा, अत्यंत पापी रजो गुण में उत्पन्न क्रोध है इसे तुम यहां बैरी ही जानो।

जिसकी बुद्धि का निरोध नहीं हुआ है उसकी वृत्ति अनन्त शाखाओं वाली होती है यथा।

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेट कुरूनन्दन।
बहुशाखा ह्मनन्ताष्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम। (अध्याय 2,श्लोक 40)

रावण के परिवार में सभी कामी और क्रोधी थे। भगवान राम के प्रति उसकी नफरत एक निष्ठ होने पर वह योगी हो गया था। तो तप करने पर रावण, कुंभकरण और विभीषण ऊपर उठे। पर दैहिक कामनाओं के कारण रावण और कुम्भभकरण नीचे गिर गये पर विभीषण स्वयं के लिये कामना रहित थे अतः ऊपर ही रहे।

रावण का नाम रावण कैसे पड़ा। उसने बाहुबल का परीक्षण करने के लिये हिमालय को ऊपर उठाया तब भगवान शंकर ने पैर के अंगूठे से हिमालय को हल्के से दबा दिया। इससे उसकी उंगलियां पिच गई और वह रो दिया। उसका रूदन रूद्र को अच्छा लगा तब से उसका नाम रावण पड़ गया। कुछ छदम बुद्धिजीवी रावण की प्रशंसा करते नहीं थकते कि वह विद्वान था, कि उसने सीता जी को हाथ तक नहीं लगाया जबकि श्री लक्ष्मण ने उसकी बहन की, नारी होते हुये भी, नाक तक काट ली थी इत्यादि।

दूसरी ओर रावण लुटेरा था, उसने उसके बड़े भाई की लंका एवं पुष्पक विमान छीन लिये थे। अत्यंत कामुक था, उसने रंभा को उसकी इच्छा के विरूद्ध पटक कर बलात्कार किया था। रंभा ने ही उसे पाप दिया था कि यदि किसी स्त्री की इच्छा के विरूद्ध उसने हाथ लगाया तो उसके सिर के सौ टुकड़े हो जायेंगे।

इसलिये वह भगवती सीता को हाथ नहीं लगा पाया था। इससे उसकी कोई महानता नहीं थी। अत्यंत क्रोधी एवं असहनशील था। उसने मारीछ को उसकी इच्छानुसार कार्य न करने के पर चन्द्रहास उठा ली थी। विभीषण को भरी सभा में लात मारी थी। हमेशा क्रोध में उफनता रहता था। मूर्ख था। उसी के हठ के कारण राक्षस कुल के सदस्य एक-एक करके मरते गये। इस तरह वह हठी भी था। चोर एवं धोखेबाज था। वह भगवती सीता को धोखे से चुरा कर ले आया था। यह कृत्य उसकी मूर्खता का भी उदाहरण है। क्रूर था। अभिमानी, दम्भी, और दर्प करने वाला था। प्राकृत एवं राठी था। नारियों का अपमान करने वाला था। लोभी था। उसका पूरा जीवन चरित्र दुगुर्णों से भरा था। बड़बोला था जिसे छद्म बुद्धिजीवी विद्वता कहते हैं।

अब हम सूर्पनखा के नाक काटे जाने वाले प्रकरण पर आते हैं। सूर्पनखा अत्यंत कामुक एवं मूर्ख औरत थी। वह भगवान राम या लक्ष्मण से बलात सम्बन्ध बनाना चाहती थी। जब उन्होनंे मना कर दिया तो वह उन्हें मारने दौड़ी। भगवान ने तो केवल उसकी नाक ही काटी वरन् आत्म रक्षा में तो मृत्युदंड भी क्षम्य है।

नाक काटना उसके दम्भ को चोट पहुंचाने जैसा था। वह चुगलखोर एवं बेशर्म थी इसीलिये कटी नाक लेकर भाई के सामने उन्हें उकसाने पहुंच गई थी। उसकी नाक काटने पर तो राम एवं लक्ष्मण सौम्य ही प्रतीत होते हैं।

रावण कामी था, इसीलिये क्रोधी था, इसीलिये उसकी बुद्धि भ्रष्ट थीः

ध्यानतो विषयान्पुंसह संगतेपूपजायते।
संगात सन्जायते कामः कामात्क्रोधो भिजायते।
क्रोधदभवति सम्मोहः बुद्धिनाषो बुद्धिनाषात्प्रणिष्चनि स्मृति।
भ्रषाद् बुद्धिनाषो बुद्धिनाषात्प्रणिष्यनि । (अध्याय 2,श्लोक 62 एवं 63)

कुम्भकर्ण तमो गुणी था।

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम।
प्रमादालस्य निद्राभिस्तन्निवहनाति भारत।


लक्ष्मण

लक्ष्मण यानि लक्ष्य का मनन करने वाले। वह लक्ष्य क्या था। ज्ञान। भगवान राम ज्ञानमय हैं। अतः लक्ष्मण उनका अनुसरण करते रहे। ज्ञान या भगवान के अनुसरण में वे ब्रह्मचारी रहे। बगैर ब्रह्मचर्य के ज्ञान प्राप्ति दिवा स्वप्न है। दूसरी ओर ब्रह्मचर्य है तो ज्ञान स्वयं प्रकट हो जाता है। काम मतलब अज्ञान।

‘‘अज्ञानने आवृत्तं ज्ञानं तेज मुहृान्ति जन्तवः’’

अज्ञान से ज्ञान ढ़ंका हुआ है उसी अज्ञान से प्राणी मोहित हो रहे हैं। जब अज्ञान हट जाता है तो प्राणी स्वयं के ज्ञान रूपी प्रकाश से परमात्मा को देखकर तदात्म्य हो जाता है।

ज्ञान का अनुसरण चाहे जीवन संकट में पड़ जाये करते रहना चाहिये। ज्ञान स्वयं प्राणी को बचा लेता है। इस उदाहरणानुसार श्री लक्ष्मण को शक्ति लग गई थी। उस समय ज्ञान जागता था। उन्हीं भगवान की जागृति से लक्ष्मण संजीवनी पाकर पुनर्जीवित हो सके।

भगवान राम और लक्ष्मण में अंतर नहीं हैः ज्ञानी त्वात्मेव में मतः। ज्ञानी मेरा ही रूप है। ज्ञान के सानिध्य के लिये प्राणी अपने सगे संबंधियों तक को छोड़ देता है। राम के साथ के लिये लक्ष्मण ने माता सुमित्रा, पत्नि उर्मिला तक को छोड़ दिया था। वह भरत एवं शत्रुघ्न से लड़ने तक को तैयार हो गये थे भगवान राम एवं माता सीता पुलाव (घास का बिस्तर) पर विश्राम कर रहे थे और निशाद राज एवं वीरासन में लक्ष्मण जाग रहे थे। निशाद राज ने पूछा‘‘ भाई लक्ष्मण, भगवान राम को राजा और माता सीता को जब सामाज्ञी होना था तब वे निष्कासित जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

तब लक्ष्मण जी ने ने निस्पृह होकर कहा ‘‘ कोई राजा या रंक नहीं होता विश्व कर्म प्रधान है एवं यह अवस्था कर्मफल है।’’

ऐसे ज्ञानी थे लक्ष्मण जी। लक्ष्मण जी को अनन्त का अवतार माना जाता है। वे शेष नाग के अवतार माने जाते हैं जिन पर भगवान विष्णुशयन करते हैं व जिनके सिर पर पृथ्वी स्थित है। इसीलिये माता सुमित्रा से वे वनवास की आज्ञा मांगने जाते है तब माता कहती हैः

तुम्हरे काज राम वन जाहीं। दूसर हेतु तात कछु नाहीं।

यानि भगवान राम पृथ्वी का भार कम करने के लिये अवतरित हुये हैं। वह अप्रत्यक्ष रूप से तुम्हारा भार कम कर रहे है।

कहते है कि भगवान लक्ष्मण कृष्णावतार में बलराम जी के रूप में अवतरित हुये।

भरत

भरत का मतलब होता है भर्ता। भर्ता पालन करता होता है। भगवान ही कत्र्ता एवं भोक्ता हैं।

उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेष्वर।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन पुरूषः परः। (अध्याय 13, श्लोक 22)

हालांकि कैकई ने भरत के लिये राज्य मांगा था पर उन्होनंे निष्कासित राजा का जीवन जिया। वे रजो गुण से सत्व गुण के रूप में उत्पन्न हुये थे। ये गुण आपस में क्रियायें करते हैं इसी से संसार चल रहा है भरत को हम ‘भक्ति’ में ‘रेत’ के रूप में भी ले सकते हैं भक्ति या निष्ठा ज्ञान से बढ़कर बतलाई गई है। भरत भगवान राम की खड़ाऊ को सिर पर धारण कर वापिस लौटे थे। कहीं भी साहित्य में नहीं आता कि भगवान राम के शेष दो भाइयों ने ऐसा किया हो। श्रीमदभगवत गीता के बारहवें अध्याय में भगवान ने भक्ति को ज्ञान या सन्यास से श्रेष्ठ बतलाया है।

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्यस मत्पराः।
अन्त्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते।
तषामहं समुद्वर्ता मृत्यु संसार सागरात।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेषित चेतषाम।

भरत ने अयोध्या जनपद की प्रजा का, भगवान राम की चैदह वर्ष की अनुपस्थिति में पालन किया था अतः वे अपने भरत नाम को सार्थक करते हैं। वे भगवान राम के एकनिष्ठ भक्त रहे अतः वे भरत थे।

शत्रुघ्न

शत्रुघ्न का अर्थ होता है शत्रु का हनन करने वाला। भगवान राम ने शत्रुघ्न को दक्षिण का राज्य दिया था। विदिषा उनके लड़के की राजधानी था, जो अयोध्या से कई सौ मील दक्षिण में है।

पुत्र अंत्येष्टि यज्ञ में जो ‘खीर’ दशरथ को प्राप्त हुई उसके दो भाग किये गये। आधा भाग माता कौशल्या ने ग्रहण किया। इससे सर्व गुण संपन्न रामावतार हुआ। आधे के फिर आधा भाग किया गया। यह कैकई ने ग्रहण किया। उससे त्याग प्रति मूर्ति भरत ने जन्म लिया। फिर शेष खीर के दो भाग किये गये, एक भाग माता कौशल्या ने और एक भाग कैकई न जाकर सुमित्रा को दिया। उनके दो पुत्र हुये। एक शेषवतार त्याग की मूर्ति भक्त श्रेष्ठ महा योद्धा लक्ष्मण हुये। दूसरे शत्रु का हनन करने वाले महावीर शत्रुघ्न हुये।

भगवान के अयोध्या लौटने के बाद दक्षिण में राज्य का विस्तार शत्रुघ्न ने किया। हालांकि भगवान ने प्रतिज्ञा की थी कि वे धरती को राक्षस विहीन कर देंगे पर ऐसा हो न सका।

मथुरा में लवणासुर नाम का दैत्य हुआ जो रावण के समान ही शक्तिशाली था। उसे मारने के लिये शत्रुआंे का हनन करने वाले शत्रुघ्न प्रस्थित हुये। शत्रुघ्न ने इस पर विजय प्राप्त की एवं लौटते मंे महर्षि वाल्मिकी के आश्रम में रूके। तभी भगवान राम के पुत्र श्रीमान लव एवं कुश का जन्म हुआ।

रामायणः अतृप्त इच्छाओं की गाथा

रामायण में केवल हनुमान जी की इच्छायें ही पूरी हुई क्योंकि भगवान राम की भक्ति के सिवाय उनकी कोई इच्छा नहीं थी। इसी तरह माता कौशल्या की कोई इच्छा नहीं थी। वे स्थित प्रज्ञ थीं, एवं ज्ञानी थी।

महाराज दशरथ की इच्छा थी कि भगवान राम युवराज बनें। पर किसे मालूम था कि वे यह अतृप्त इच्छा लिये ही स्वर्ग चले जायेंगें। यह तीव्र इच्छा उनके जीवन मंे पूरी नहीं हो सकी।

माता कैकई की इच्छा थी कि भरत लाल उनसे प्रसन्न रहें एवं राजा बनें। उन्होनंे श्रीमान दशरथ से दोनो वर भरत की प्रसन्नता के लिये ही मांगे थे। मगर भरत ने फिर शेष जीवन उनसे मां नहीं कहा बल्कि उनसे अपशब्द ही कहते रहे। वे राजा तो खैर बने ही नहीं।

भरत लाल ने कल्पना नहीं की थी कि उनके कारण भगवान राम को वनवास प्राप्त होगा। वह कलंक उनके माथे पर लग गया जिसका पश्चाताप उन्हें आजीवन होता रहा।

माता सीता से भगवान राम ने अयोध्या में ही रह कर राजा दशरथ और तीनों माताओं को सात्वना देते रहने को कहा था। वे नहीं मानी। उन्होनंे भगवान राम से सोने का मृग लाने को कहा था। हालांकि भगवान राम अनिच्छा से मारीच के पीछे गये पर वह सोने का मृग सीता जी को नहीं मिला। उल्टे उनका अपहरण हो गया। जब प्रकृति में लोभ जागृत होता है तो वह पुरूष से तो अलग हो ही जाती है। तामसी वृत्तियों के चंगुल में फंस जाती है। अयोध्या लौटने के बाद उन्हंे दुबारा वनवास भुगतना पड़ा। धुनष भंग के समया उन्होनें सोचा भी नहीं था कि उन्हें भगवान राम का साथ अल्प समय के लिये ही मिल पायेगा।

सूर्पनखा की इच्छा थी कि भगवान राम या लक्ष्मण उसे प्राप्त हों, उल्टे उसकी नाक और कट गई।

लक्ष्मण वध के लिये मेघनाद ने यज्ञ प्रारंभ किया पर वह बीच में ही ध्वंस हो गया। मेघनाद लक्ष्मण का वध नहीं कर पाया।

रावण ने सीता हरण दो कारणों से किया था।

1. सूर्पनखा की मुख विकृति का बदला लेना।
2. फिर सीता को प्राप्त करना।

उल्टे उसके सामने उसकी लंका जल गई। उसका पूरा कुल उसके सामने खत्म हो गया एवं वह मृत्युजयी मृत्यु को प्राप्त कर धराशायी हो गया।

भगवान राम

भगवान राम दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र हैं। दशरथ पूर्व जन्म में मनु एवं कौशल्या शतरूपा थीं। उन्होनें तप किया था तब परमात्मा प्रकट हुये। परमात्मा ने उनसे वर मांगने को कहा तब उन्होनंे निर्गुण परमात्मा से सगुण रूप में वह भी पुत्र के रूप में पाने की इच्छा प्रकट की तब भगवान ने वर दिया कि वह यथा समय अगले जन्म में उनके पुत्र के रूप में अवतार लेंगे।

यह भी श्रुति है कि भक्त नारद ने भगवान विष्णु को श्राप दिया था कि जिस तरह माया का उपयोग करके उन्हें भगवान ने नारी वियोग दिया है उसी तरह उन्हें भी नारी वियोग सहना पड़ेगा। फलस्वरूप भगवान ने राम के रूप में जन्म लिया एवं सीता का वियोग सहा।

राम परमात्मा के पूर्णावतार थे। हालांकि भगवान कृष्णानुयायी भगवान राम को बारह कलाओं युक्त एवं भगवान कृष्ण को सोलह कलाओं युक्त मानते हैं। इस तरह उनकी दृष्टि में भगवान कृष्ण ही पूर्वावतार र्हैं। भगवान परमात्मा हैं। पहले कहा जा चुका है कि दशरथ शरीर के प्रतीक हैं। जब शरीर से आत्मा निकल जाती है तब शरीर मृत हो जाता है। इसीलिये जब राम ने वन गमन किया तो दशरथ मृत हो गये।

पर माता कौशल्या, कैकई एवं सुमित्रा को प्रकृति के तीन गुणों के रूप में याद किया गया है। सीता मां मूल प्रकृति है। प्रकृति एवं पुरूष अनादि हैं। अतः राम के वन गमन पर केवल दशरथ का ही स्वर्गवास हुआ।

भक्त जब भगवान को याद करते हैं तब भगवान स्वयं चल कर उनके पास जाते हैं जैसे भगवान राम स्वयं चल कर अहल्या, शबरी श्री हनुमान, या विभीषण के निकट पहुंचे।

बुध कौषिक ऋषि को भगवान राम ने कृपा कर स्वप्न में राम रक्षा स्त्रोत दिया। उन्होनें कहा हैः

राम रक्षां पंठेत प्राज्ञः पापध्निम् सर्व कामदां।
नरो ने लिप्यते पापैर्भक्तिं मुक्तिं ता वन्दति।।

बुध कौषिक स्वयं कहते हैंः

अभिरामस्त्रिलोकानाम् रामः श्रीमान्सनः प्रभो।

तुलसी कृत रामचरित मानस वह नहीं है जो महर्षि वाल्मिकी कृत रामायण है। वाल्मिकी जी ने नारद जी से पूछा था कि वे तत्कालीन आदर्श पुरूष बतलायें जिन पर महाकाव्य लिखा जा सके। तब उन्होनें भगवान राम पर महाकाव्य लिखने की प्रेरणा दी जबकि रामचरित मानस की रचना भगवान शंकर ने की।

रामचरित मानस में यूं तो कई विशिष्टताये है पर एक विशिष्टता यह भी है कि पुरूष से पहले प्रकृति को याद हर स्थान पर किया है। जैसेः

वर्णनानामर्थ संघानां रसानां छनद सामुपि।
मंगलनाम चकर्तारौ वन्दे वाणी विनायकौ
भवानी शंकरो वन्दे श्रद्धा विश्वास रूर्मणौं।
या सिया राम मय सब जग जानी
करहूँ प्रणाम जोर जुग पाणि।

हम पुरूष का वर्णन नहीं कर सकते। प्रकृति के वर्णन के पश्चात जो शेष रहता है वही पुरूष है वैसे तो।

हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहिं सुनहिं गावहिं श्रुति संता।

हम श्री राम का वर्णन कैसे कर सकते हैं। उनकी कथायें उनका शरीर है। आत्मा तो अजन्मा, अनन्त, अवर्णनीय है।


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