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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



धर्म परिवर्तन कायरता है


अजय कुमार दुबे


धर्म परिवर्तन वर्तमान में धन की दुष्ट प्रवृति का परिचायक है। आज समस्त मूल्यो का ह्रास धन की महत्वकांक्षा के कारण हो रहा है। धर्म को सब कुछ मानने वाला मनुष्य प्रत्येक मानवीय मूल्यों का विनाश कर रहा है। वह अज्ञानता के कारण सत्य का गला घोंट रहा है। धर्म की आवश्यकता अब नही रह गई है,तभी तो लोग लोग कपड़े बदलने के समान धर्म को समझने लगे हैं। धर्म परिवर्तन से क्या मनुष्य की प्रवृतियाँ,रहन सहन ,उसका मानसिक स्तर भी परिवर्तित हो जाता है? अगर होता तो प्रत्येक व्यक्ति धर्म परिवर्तन करके डाक्टर,इंजिनियर,वकील या कोई महानता प्राप्त कर लेता। धर्म किसी बपौती नही है। धर्म स्वंय में कुछ नही होता। धर्म कोई एक व्यक्ति नही है,हमारे देश में अनेकों जातियाँ,धर्म,संस्कृतियाँ हैं। इनका मिश्रित जीवन पद्धति ही हमारे देश की अनेकता में एकता है। राष्ट्र में हिन्दू,मुसलमान,अथवा हरिजन होने न होने से देश की एकता में कोई असर नही होता। यह कहना कि किसी के हरिजन, मुसलमान, हिन्दू, ईसाई, आदि होने न होने से कोई अन्तर पड़ने वाला है-बेमानी है।

यह धर्म परिवर्तन तो राजनीतिज्ञों, व्यवस्थापकों की अक्षमता का स्पष्ट प्रमाण है,जब कोई अपना धर्म परिवर्तन करता है तो शासन की अव्यवस्था, नौकरशाही, की नृशंसता, शासक की सही निर्णय लेने की अक्षमता,अयोग्यता तथा जन सामान्य की दयनीय स्थिति का ही परिणाम है-धर्म परिवर्तन।

आज तक हरिजनों, दलितों के हितों में जितने भी आन्दोलन हुये, वे केवल कुछ नेताओं, बुद्धिजीवि वर्ग तक ही सीमित रहे क्योंकि ये आन्दोलन सतही रहे ,उसी प्रकार जैसे कोई बड़ा लेखक,नेता एयरकन्डीशन कमरे में बैठ कर अपने उपन्यास,कहानियों व गरीबों पर लिखें या कोई वक्तव्य दे। उन्हांेने न जन सामान्य की आवश्यकता को समझा,न अपने जीवन को उनके जीवन से मिलाने का प्रयत्न किया। यही कारण है कि वे अपने प्रति किये गये एवं ंकिये जा रहे आतंकपूर्ण व्यवहार से स्वयं को आज तक मुक्त नही कर पाये और न जन साधारण की जीवन पद्धति और जीवन स्तर में कोई सुधार कर पाये।

छोटे-छोटे कार्यों को सम्पन्न करने वाले जैसे बुनकर, कुम्हार, मछुआरे, लोहे से पीट-पीट कर उपयोगी वस्तुयें बनाने वाले, बाँस की डलियाँ, चटाई,पंखे बनाने वाले,कश्मीरी शाल पर कढ़ाई करने वाले,अपनी मेहनत की कमाई करने पर निकलने वाले पसीने के कारण अधिक महत्वपूर्ण हैं। वे अधिक महत्वपूर्ण हैं,उनकी अपेक्षा जो किसी प्रकार का परिश्रम किये बिना भी ‘‘भगवान’’,देवता,महान जैसी उपाधियों से पुरिष्कृत होते हैं।

जिस देश में जन सामान्य को विस्मिृत कर दिया जाता है,उनकी जान-माल की सुरक्षा नही की जाती, उन्हें पद दलित किया जाता है,वहाँ होता है-धर्म परिवर्तन। जो जातियाँे शताब्दियों से आक्राताओं द्वारा आतंकित रही अपने बारे में नही सोच पाई। नपुंसक जातियों का विरोध उस दुष्ट प्रवृतियों एवं भृष्ट व्यवस्था के विरुद्ध है लेकिन कायरता पूणर््ा है,समस्या का हल धर्म परिवर्तन नही है। किसी व्यक्ति अथवा समुदाय द्वारा अत्याचार,शोषण से पीड़ित होकर दूसरे धर्म का वरण कर लेना, सुविधाजीवि होकर जीना समस्या का हल नही है। अपने अधिकारों को पाने के लिये संघर्ष करना होगा। जब संघर्ष केवल सिद्धान्त के धरातल पर होता है तो हम सिद्धान्त पर अपनी प्रवृति का विरोध कर व्यक्ति के साथ जी लेते हैं,सुविधाजीवि बन जाते हैं परन्तु जब संघर्ष के कर्म क्षेत्र पर उतरने के बाद कोई समझोैता ,समन्वय नही होता तो वहाँ होता हैं,शोषितों का प्रतिशोध। प्रतिशोध भी निज स्वार्थ में नही, जन सामान्य के लिये,राष्ट्र के लिये लेकिन जिस व्यक्ति में वीर्य नही है,जिस जाति में सोच नही, जिस धर्म में सहिष्णुता नही है, उसका सर्वनाश कहीं बहुत दूर नही आस-पास ही खड़ा राह देखता होगा।

जिस समाज,समुदाय,अथवा समूह के लेाग अपने तथा अपने परिवेश के प्रति सजग नही रहते,उदासीन और अपने में ही लीन रहते है,अपने झूठे, थोथे अहंकार में डूबे रहते हैं,वह समूह जाति,अथवा धर्म जीवित है,यह कैसे मान लिया जाय। वे जीवित हैं, यह प्रश्न उन्हीं धर्म के ठेकेदारों से पूछा जाना चाहिये कि आखिर उस शोषित लोगों के धर्म परिवर्तन सेे नुकसान क्या है? क्योकि इस नुकसान के जिम्मेदार तो वे स्वयं हैं,जो यह प्रश्न उठातें हैं। दलित, दमित, पीड़ित जन सामान्य को आगे लाने, उन्हें उनके अधिकारों के प्रति सचेत कराने, उन्हें पशु के धरातल से उठा कर मनुष्यता के धरातल पर लाने का कार्य हमने कहाँ किया है? हमने किया है झूठे, थोथे नियम,कायदे, कर्म कान्डों का थोथा प्रचार और भूल गये है, अपने आप को भी अपने अहंकार में-हम हिन्दू हैं, देवता हैं,ब्राह्यण है,ठाकुर, जमीदार हैं,नेता हैं, मंत्री हैं,अधिकारी है-भूल गये हैं कि हम मनुष्य भी हैं।

जिस समाज में विरुदावलियाँ गाई जाती हैं,साहित्यकार बुद्धिजीवि कहलाने वाले विद्वान जब राष्ट्रों की शक्ति से लोंगों के मन में अन्याय के प्रति विरोध करना नही बताते,उचित अनुचित का अन्तर नही बताते तो अन्याय का विरोध धीरे-धीरे विप्लव में बदल शस्त्र शक्ति,हिंसा में परिवर्तित हो जाता है परन्तु उसमें भीरु वीर्यहीन लोग अन्याय और शोषण का विरोध न करके धर्म परिवर्तन में अपनी सुरक्षा देखते है। कितने मूर्ख हैं वे लोग जो अपने धर्म में रह कर शोषण अन्याय का विरोध न कर सका हो और अपना धर्म ही परिवर्तन कर लिया हो, क्या आवश्यक है कि उस धर्म अथवा उस समुदाय द्वारा किये जाने वाले शोषण अन्याय का प्रतिकार कर पायेगा? जीवन संर्घष है,पलायन नही। अन्याय तथा शोषण का प्रतिकार करने के कारण होने वाले संर्घष में किसी प्रकार संकोच नही करना चाहिये। जन कल्याण के लिये किया गया कार्य वीरता का पचिायक है,अन्याय के विरुद्ध मन में जो घृणा उपजती है,वह नैतिकता की दृष्टि से सात्विक न हो परन्तु ऐसी घृणा वंदनीय है, पवित्र है,अलौकिक है। उसे तो रोये-रोयंे में संचित करना चाहिये। समाज में ऐसी घृणा न रहे तो शोषण ओैर अत्याचारी के विरुद्ध कौन खड़ा होगा? इस प्रकार किसी व्यक्ति अथवा समुदाय में उपजी घृणा अपने आप में विशिष्ट होगी।

समाज में होने वाले अत्याचारों को मात्र सुन कर ,उनकी सूचना पढ़ कर सामान्य के प्रति व्यक्ति के हृदय में असहमति तो हो सकती है,उसके विरुद्ध तीव्र ज्वलंत, उग्र विरोध उत्पन्न नही होता। हम सूचनात्मक सतह पर ही उससे जुडते हैं,भावनात्मक धरातल पर कोई संबन्ध हम ग्रहण नही करना चाहते अथवा नही होता ,तब कही भी सनसनाहट नही होती,कोई सुगबुगाहट नही होती तब क्या हम आशा करें कि शोषित लेाग धर्म परिवर्तन न करें। अत्याचार से पीड़ित व्यक्ति ही सबसे अधिक दुखी होता है,वही दुख उसे अत्याचार से लड़ने के लिये शक्ति भी देता है। अत्याचार के नाश के लिये उसको भोगना भी आवश्यक है। जो व्यक्ति, समाज, धमर्, जाति, जितनी बडी अत्याचारी शोषक होगी,वह उतनी तीव्र आम आदमी में न्याय के लियंे ज्वाला भड़काती है। जिस देश में बुद्धिजीवि,साहित्यकार,राज्याश्रित होकर अपनी योग्यता को धन के बदले बेच देते हैं-वहाँ समाज में व्यक्ति को त्याज्य,निर्धन,अछूत,शूद्र मान लिया जाता है, ऐसा ही हमारे देश में हो रहा है।

हरिजनांे को आरक्षण देकर शासन ने उन्हें गुलाम बना लिया है। सड़ी-गली अंग्रेजों द्वारा अपने हित में प्रारंभ की गई शिक्षा प्रणाली ने हरिजनों का ही नही देश की युवा शक्ति के प्रति अन्याय ही नही शोषण भी किया है। छोटी जातियो़ं छोटे काम करके अपनी आजीविका चलाती है, वे छोटे काम भी उनसे छीन लिये गये, उन्हें सुनहरा सपना दिखाकर समाज के युवकों को पीढ़ी दर पीढी उनकी योग्यता, उनकी संस्कृति,विचारांे को उनसे विलग कर उन्हें सामाजिक दृष्टि से भिखारी बनाया जा रहा है।

उन्हें स्वाभिमान,कर्मयोग,आत्मनिर्भरता,देश भक्ति कर्मठता, संर्घष की मानसिकता के बदले गुलामी दी जा रही है-उस समाज में जहाँ असमानता,अत्याचार शोषण अव्यवस्था का एक छत्र साम्राज्य है।

धर्म परिवर्तन को रोकने का एक मात्र उपाय समाज में शिक्षा की उचित व्यवस्था हो। शिक्षा का स्वरुप क्या हो,यह निर्णय उन पर ही छोड़ना होगा जो धर्मपरिवर्तन मंे सहायक है। परन्तु एक विचारणीय प्रश्न यह है कि यह धन के माध्यम से हो रहा है तो इस प्रवृति को रोकना होगा अन्यथा देश के सारे ही लोग अपनी आस्था्रयें भूल जायेगें और सारे देश में धर्म परिवर्मन की बाढ़ आ जायेगी।


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