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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



"प्रीति"


शुचि 'भवि'


बहुत निराश सी वो, अकेली एक बेंच पर बैठी, आती जाती भीड़ को देख रही थी।कभी ट्रैन से उतरते यात्रियों को,कभी सामान बेचते बच्चों को,कभी चेन बनाते बाबा को,सब कुछ देखते हुए भी मानो कुछ न दिख रहा था उसे।अचानक बजी फ़ोन की घंटी से उसकी जागृत निद्रा टूटी।

हेल्लो,आधे घण्टे लेट है ट्रैन,पहुँचता हूँ बस,,,

जी कह उसने फ़ोन रख दिया था।

ये पहली बार था जब वो कहना कुछ चाहती थी और कह कुछ रही थी,करना कुछ चाहती थी और कर कुछ रही थी।

पहली बार तो मिल रही थी न वो अपने इस अनजान मित्र/शत्रु से।

क्यों मिल रही थी,नहीं जानती थी।

क्यों मना न कर पाई,नहीं जानती थी।

भयभीत सी थी बेहद।

4 महीने पहले ही तो दोस्ती हुई थी न,और अचानक एक दिन फ़ोन कर उसने बताया वो आ रहा है मिलने।

कॉलेज की सहेली ने दोस्ती कराई थी उसकी ऑनलाइन वाली,इससे अधिक वो कुछ जानती भी तो न थी।आज उसकी सहेली भी भाई की शादी में व्यस्त थी,उसके साथ न आयी।

तभी ट्रेन रुकी और फ़ोन बजा,मैं गेट के पास हूँ,तुम कहाँ हो??

उसके पैर जम गये थे,चलने से इंकार करते हुए।किसी तरह वो गेट तक पहुंची और प्रफुल्लित होने का दिखावा कर मिली।

कालेज के समय में वो होटल के उस कमरे में एक अनजान के साथ थी जिसे सिर्फ ऑनलाइन जाना था उसने।बातों का सिलसिला चलता रहा,अचानक वो उठा और उसे बाँहों में भीच लिया।नहीं नहीं,,ये आप क्या कर रहे हैं,

आँख के कोर से अश्रु छलक उठे।

दिमाग मगर चैतन्य था,माँ और पिताजी का चेहरा दिखने लगा।फ़ोन पर मुश्किल से ही सही 1 नंबर दबा और 5 min में सहेली की आवाज़ कमरे के

दरवाजे को खटखटाती हुई, खोलो खोलो

प्रीति दरवाज़ा तो खोलो।

भागते हुए उसने दरवाजा खोला और सहेली से लिपट गयी।

घर पर सहेली संग माँ,पिताजी,भाई ,बहन को पूरा किस्सा सुनाया।

ग्लानि आँखों से टपकती रही और वो बोलती रही,,

माँ आपकी शिक्षा ने मुझे बचाया आज,आत्मरक्षा के सारे तरीके आपने जो सिखाये थे वो आज मैंने अपनाए , बाबूजी,आपकी बात न मानने का परिणाम देख लिया हमने,ये आभासी दुनिया,आभासी लोग,कुकर्म मगर जो करते हैं वो सच्चे होते हैं, ये समझ हमें आज मिली और इसे हम अपने तक ही न रखेंगे,अपने हमउम्र को जरूर सावधान करेंगे बाबूजी, बहुत लोग हमारे कालेज के ही इस भटकन में भटक रहे हैं। उन्हें बचाना ही अब हमारा आपकी बात न मानने का प्रायश्चित होगा।

माँ बाबूजी भाई बहन सब स्तब्ध हो उसका चेहरा देख रहे थे और गर्व कर रहे थे अपनी सच्ची और सरल सी "प्रीति" पर।


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