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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



सजा


डा0 शुभा श्रीवास्तव


समगति से चल रही आलोक की सांसो से मुझे अजीब सी वितृष्णा हो रही है। मन होेता है कि कहीं दूर भाग जाऊ जहाँ कोई भी नही हो सिर्फ गहरा ठण्डा पानी और उसमें सिर से पैर तक डूबी मैं, और कोई नही, कहीं नही। कभी कभी सोचती हूँ कि क्या आलोक को यह सब समझ आयेगा। नाड़ी और धमनी पर दिन रात बात करने वाला क्या दिल की धड़कनों को बायोलाजिकल ढांचे से इतर महसूस कर पायेगा। क्या इस हार्ट स्पेशलिस्ट को इस देह से परे जो धड़कने है वह सुनाई देंगी,शायद कभी नही। मेरी सिसकियों और उनके नींद के खर्राटे की गति सम है। अब मैं अपने को इस बिस्तर पर रोक नही पाऊँगी। प्रिया फ्रीज से बर्फ और ठण्डे पानी की बोतलों से पानी बाल्टी में डालती है। वह यन्त्रवत हाथों से पानी शरीर पर डालती है। हाथ से क्लचर जैसे ही बालांें से हटते हंै वैसे ही लम्बे काले बाल गर्दन से होते हुए कमर तक खुल जाते हंै। प्रिया को याद आता है कि इन बालों से खेलना आलोक को बहुत पसन्द है। शादी की पहली रात आलोक पास में आते ही इन बालों को खोल देते है। हॅास्टल में रहते हुए जब हमारी मित्रता हुई थी तभी से वह इन बालों के दिवाने है पर आज शादी की पहली रात आलोक के पास इन बालो को खोलने का अधिकार है। वह जानती है कि आलोक आज किसी सीमा में नही बधेंगें। आज तक शादी की बात कहकर ही वह आलोक को रोकती आयी है। वह आलोक को ध्यान से देखती है। उसका प्यारा रूप अपने भीतर सहेज कर रखना चाहती है। ये झील सी आँखें, काले बाल और यह चैड़ा सीना जिसमें छुपकर सारे दर्द बिखर जाते है। प्रिया वहाँ छुपना चाहती है पर अपने ऊपर झूके आलोक के सीने पर निगाह पड़ते ही उसके रोंए खड़े हो जाते है, फिर वही भयावह मंजर - एक औरत पर झूके कई पुरूष उस औरत को क्षत-विक्षत करने को उद्यत, आखों में आँसू लिए एक बेबस छोटी लडकी, और चित्कार करती औरत अपने उपर से पुरूषों को हटाने का प्रयास करती हुई। अचानक उस औरत में माँ का चेहरा दिखाई देता है और वह छोटी लडकी प्रिया बन जाती है। उसका दम घुटने लगता है और घबड़ाहट में वह आलोक को धक्का देकर खड़ी हो जाती है। आलोक की मुस्कान उनके चेहरे से गायब हो गई थी। प्रिया के दिल में आलोक की वही पुरानी सधी मुस्कान अटक जाती है। यादों सें बाहर आकर प्रिया ठण्डा पानी सिर पर डालती है। प्रिया को राहत महसूस होती है जैसे आग पर पानी की छोटी-छोटी बौछार पड़ती है वैसे ही प्रिया को अपना शरीर महसूस होता है। गाउन पहन कर वह दूसरे कमरे में आकर बैठ जाती है। अपने आप में खोये हुए प्रिया को काफी समय हो जाता है तभी आलोक के हाथ प्रिया के बालों को सहलाते है। आलोक ने मुस्कुराकर पूछा, "क्या आज भी नींद नही आई?"

"नहीं"

"क्यों तुम्हें नींद नही आती है।’’ आलोक के प्रश्न पर शांत रहकर प्रिया जबाब देती है- "पता नहीं।"

‘‘यह कोई जबाब नही है- आलोक के कहते ही प्रिया बोल पड़ी -मेरे पास जवाब नही है।’’

तो सवाल करो। शायद सवाल करने से तुम्हें अपनी बेचैनी और छटपटाहट का पता चल जाय।’’ आलोक के इतना कहते ही प्रिया की आखों में कुछ बूंदे छलक जाती है। वह कहना चाहती है कि मुझे डूबने से बचा लो आलोक। मैं अपने जीवन के अधूरेपन को जबरदस्ती ढंकने की चाहत में अपना अतीत न भूल पाने के कारण वर्तमान जीवन से असन्तुष्ट हूँ। पर तुम्हें लगेगा कि मैं फिर वही व्यर्थ की बाते लेकर बैठ गई हूँ। फिर तुम्हारे पास बातें सुनने का वक्त कहाँ है। दिल की बाते याद करके नोट नही की जाती है कि तुमने कहा बताओ क्या बात है और मैं लिखी बातें कह दूं। दिल की अपनी एक गति है वह अपने हिसाब से चलता है वह कभी सीधे असल मुद्दे पर आता है और कभी सब कुछ व्यर्थ कहने के बाद भी नही आ पाता है। पर यह सब बाते मैं कैसे समझा पाऊँगी तुम्हें। तुम तो दवा के पर्चे से लेकर मरीज तक, नर्स से लेकर हास्पिटल तक सिर्फ मुद्दे की बात करते हो। इतना वक्त कहाँ है तुम्हारे पास की व्यर्थ की बातें की जाय और उन बातों से भावनाएं जोडी जाय। अचानक निगाह मिलते ही अहसास हुआ कि आलेाक मुझे लगातार देख रहे हैं। मैं यह आँखे बर्दास्त नही कर पाऊँगी । मैं वहाँ से भागना चाहती हूँ। मैने महसूस किया मेरे होठ आलोक से कह रहे थे- मैं लॉन में टहलने जा रही हूँ। नंगे पैर पर हरी घास कितना सुकून देती है। काश ये ओस की बूदंे इन पैरों से गुजर शरीर के भीतर चली जाय और अन्दर की तपन कुछ कम कर दे। पर यह सुखद अहसास क्षणिक होता है। अन्दर तो अब ............। ‘अरे! आप चाय क्यों बना लाये।’’ आलोक को सामने से आते देखकर प्रिया के मुंह से अनायस निकल पड़ा। आलोक की गहरी नीली आँखें और होठ मुस्कुराते हुए कहते हैं‘‘ कभी-कभी तो पत्नी की सेवा का मौका मिलता है।’ मुझे भी हंसी आ जाती है ढेर सारा प्यार भीतर उमड़ने लगता है। कितना ख्याल रखते है मेरा। जी चाहता है पास बिठाकर चूमती जाऊ तब तक जब तक भीतर सब कुछ ठीक न हो जाय।’’ झुके हुए आलोक की शर्ट की बटन खुले थे प्रिया हाथ बढ़ाकर आलोक के सीने को सहलाना चाहती है मगर फिर वही भयावह मंजर सामने आ जाता है। एक औरत पर टूटते हुए कई जानवर । वह सिहर जाती है। जब भी वह किसी पुरूष के शरीर को देखती है उसके रोंगटे खड़े हो जाते है। चाहकर भी वह आलोक को पूरी तरह से अपना नही पाती है वह आलोक से कहना चाहती है कि इस मझधार से मुझे निकाल लो पर शब्द अटक कर रह जाते है और हाथ रूके रह जाते है। सिर्फ कान सुनते है आलोक पूछ रहे है मां का हाल चाल पूछा? ‘‘ बगैर मेरी मर्जी के होठ जवाब देने के आदी है। भीतर चाहे जितना तूफान हो बाहर से शान्त माहौल बनाये रहते है। तभी तो बड़ी सहजता से जवाब देते हैं भूल गई पूछा नही। आलोक पूरा जवाब चाहते थे इसलिए फिर कहा- तुम्हे क्या हो गया है प्रिया । मुझे एक हफ्ता हो गया यह बताये कि मां की तबीयत ठीक नही है। मिलने नही जा सकती तो फोन तो कर सकती थी।’’ जानती हूँ मेरा यह जवाब आलोक की सन्तुष्ट नही कर पायेगा कि मैं सच में भूल गई। ‘‘तुम भूल नही गई प्रिया बल्कि तुमने चाहा ही नही। तुम दूरियाँ बढ़ा रही हो। वह तुम्हारी मां है। तुम ठीक नही कर रही हो प्रिया।"

"क्या ठीक नही कर रही हूँ मैं?"

प्रिया के कहते ही आलोक बोल उठा- "पहले भी तुम रूडली बात करती थी मां से। मैने कई बार समझाया है तुम्हें पर अब तो तुम सम्पर्क भी नहीं करती हो। पापा बता रहे थे कि मेरे फोन से हाल चाल मिलता हैं तुम्हारा। खुद नही करती हो पर उनका फोन क्यों नही उठाती हो।"

‘‘मेरी इच्छा नही होती है किसी से बात करने की।’’ प्रिया के कहने पर आलेाक बिखर जाता है। मुझसे भी बात करने की इच्छा नहीं होती। ’’

मैंने कहा न किसी से नही’’-प्रिया यथावत बनी रहकर कहती है तो आलोक पूछ बैठता है जान सकता हूँ मेरा अपराध क्या है।’’ आलोक के कहने पर प्रिया गहरी सांस लेती हुई कहती है-‘‘दोष तुम्हारा नही है। सबका कारण मैं हूँ । असन्तुष्टी मुझमें है।’’

यह असन्तुष्टी किससे है, मुझसे-आलोक जानना चाहता है पर प्रिया शांत होकर कहती है पता नही।’’ आलेाक इस जवाब से खीझ जाता है और कहता है- खुल के कहो ना कि मुझसे असन्तुष्ट हो। मैं भी महसूस करता हूँ कि तुम असन्तुष्ट हो। चाहे शरीर के पास आऊ चाहे मन के पास मुझे सिर्फ एक चीज मिलती है तुममे वह है असन्तुष्टी। पर जीवन की किसी भी रिक्तता के लिए नाता नही तोड़ा जाता है। प्रिया सीधा जवाब देती है मैनें कौन सा नाता तोड़ा है। एक पत्नी का हर फर्ज निभा रही हूँ और३३३ण्ण्! प्रिया की बात पूरी होने से पहले ही आलोक बोल उठता है- "मशीन बनकर फर्ज निभा रही हो। अपने को अन्दर ही अन्दर मार रही हो। मेरे पास आती भी हो तो मशीनी शरीर के साथ। प्रिया मैं प्यार करता हूँ तुम्हें। तुम्हें खुश देखना चाहता हूँ।"

‘‘मै खुश हूँ ’’ कहते हुए प्रिया खुद को टटोलती है। पर आलोक सच जानता है इसलिए कहता है अपने अन्दर अपनी दुनिया बनाकर अपने आप को सबसे काट कर खुश हो तुम।’’ आलोक के इस जवाब से प्रिया तल्ख हो उठती है और तीखे शब्दों में कहती है- जिनसे कटने की तुम बात कर रहे हो उनके विषय में मैं बात नही करना चाहती।

"कारण जान सकता हूँ क्यों ?’’-कहते हुए आलोक अपने को संयत रखने की कोशिश करता है।

"क्योंकि समाज के ताने सुन कर थक गई हूँ मैं", कहते हुए प्रिया बिफर पडती है

‘‘तुम थक इसलिए गई हो क्योंकि तुम भी समाज का हिस्सा बन गई हो। बेटी नही रह गई हो तुम।’’ आलोक ने खीझ के साथ कहा तो प्रिया बोल उठी मैं रहना चाहती भी नही हूँ।’’ तब आलोक ने सख्त आवाज में कहा यह तुम्हारा दुर्भाग्य है।

‘‘तो क्या वह मेरे मां बाप है यह मेरा सौभाग्य है। हर वक्त राह चलते यह सुनना कि यह उसी की बेटी है जिसके साथ दंगे में बलात्कार हुआ है यह मेरा सौभग्य है। पिता नपुंसक हैं, मैं उसी बलात्कार की पैदाइश हूँ यह मेरा सौभाग्य है। है न ’’ कहते हुए प्रिया लगभग चीख पडती है। उसे अपने आपसे घृणा होने लगती है। आलोक अपने आप को संयत रखते हुए कहता है- तुम दूसरो के कर्मो की सजा अपनी माँ को क्यों दे रही हो। अपने आप से अपने परिवार से प्यार करो तब सब ठीक होगा।

‘‘कुछ ठीक नही होगा। आदर्श बखानना आसान है उस पर चलना मुश्किल। वह पीड़ा मैं जान रही हूँ तुम नही समझोगे।’’ प्रिया ने उलाहने में कहा तो आलोक आश्चर्य से बोला मैं नही समझूंगा? बिना समझे ही तुमसे प्यार किया और शादी की है जिसे पूरी ईमानदारी से निभा रहा हूँ।’ पर प्रिया आज बहुत कुछ कहना चाह रही थी तभी तो कह रही थी प्यार तुमने तब किया जब मेरा अतीत, मेरा परिवार नही जाना था। मैनें तुम्हे जानबूझकर बताया ही नहीं था। क्या कहती मैं कौन हूँ और क्या बताने लायक था मेरे जीवन में । प्रिया के कहने पर अपना क्रोध जब्त कर आलेाक ने कहा कुछ बताने लायक रहा हो या नहीं पर सब कुछ जानने के बाद भी तुमसे शादी की है और अपने प्यार को निभा रहा हूँ।

क्या पता समाज के सामने अपने को आदर्शवादी सिद्ध करने के लिए तुमने यह सब किया हो।’’ प्रिया के ऐसा कहते ही आलोक का धैर्य जबाब दे जाता है और वह फट पड़ता हैं- तुम पागल हो गई हो, तुमसे बात करना बेकार है।‘‘ आलोक चला जाता है। प्यालियों में रखी चाय ठण्डी हो गई थी। प्रिया अपने भीतर वही ठण्डापन महसूस करती है। तो क्या आलोक सही कहते है कि मैं ठण्डी हूँ। विस्तर से लेकर रिश्तो तक, होठों से लेकर दिल तक। मैं क्यों अपने प्यार और गृहस्थी की तिलांजली दे रही हूँ। अपने अतीत से मैं क्यों नही बाहर आ रही हूूॅं। आलोक सही कहते हैं मैं अपने जीवन को अन्धेरी खाई में ढकेल रही हूंॅ। खुद को अस्वीकार करते करते में हर रिश्ते से दूर जा रही हूं। यह क्या अपने गालों पर मैं आसूओं की धार महसूस कर रही हूँ । आलोक नाराज है इसलिए ? फिर क्यंू लड़ती हँू मैं? जिसे अपने शरीर के निकट एक मिनट भी बर्दास्त नही कर सकती उसकी दूरी भी असहनीय है। क्या मेरा प्यार अभी भी जिन्दा हैं। हां जिन्दा है तभी तो माफी मांगने के लिए मैं उनके सामने खड़ी हूँ- नाराज हो गये है’’।

‘‘नाराज ? किस पर ? तुम पर ! तुम्हें नाराजगी, गुस्सा, प्यार इन सब शब्दो के मायने पता हैं ? जूते का रिबन बांधते हुए आलोक ने कहा तो प्रिया अन्दर से द्रवित हो गई और कहा अच्छा माफ कर दीजिए। आज घर चली जाऊँगी और कोशिश करूंगी कि ऐसा कुछ न हो जिससे आप दुखी हो।’’ आलोक तिरछी निगाहों से देखकर सच जानना चाहता है पर प्रत्यक्ष में कहता है ‘मैं तुम्हें खुश देखना चाहता हूँ। जीवन को जियो प्रिया। शादी के पहले तुम्हारी असन्तुष्टी ,तुम्हारी पीड़ा मेरी बाहों में आकर खत्म हो जाती थी पर अब लगता है मेरी बाहें तुम्हारे दुख को नही थाम पाती हैं। कहने से हर दुख पिघल जाता है। अन्दर ही अन्दर रखने से लावा बन जाता है। अगर मुझमे कोई कमी हो तो कहो। प्रिया का गला भर आता है वह आलोक की बाहों में समा जाती है और कह उठती है तुममे कोई कमी नही है आलोक, मैं ही अपने आपसे, अपने अतीत से छुटकारा नही पा रही हूँ। मुझे डूबने से बचा लो। तुम्हारे प्यार के सिवाय मेरे पास कुछ नही हैं। ’’ आलोक प्रिया के अॅासू भरी आँखों को चूम लेता है। प्रिया अपने भीतर ठण्डक महसूस करती हैं और अपने को आलोक की बाहों में ढीला छोड देती है। अपनी बाहों में भरकर उसे तब तक सहलाता दुलारता है जब तक वह सो नही जाती है। आलोक यथावत बैठा रहता है कई दिनों बाद प्रिया सोई थी वह उसे उठाना नही चाहता है। सोकर उठते ही प्रिया की निगाह घड़ी पर जाती है। उसने आश्चर्य से पूछा आज आप क्लीनिक नही गये? प्रिया के चेहरे पर हल्की मुस्कान आलोक को अच्छी लगती है। वह अपनी बांहो का घेरा और कस लेता है। प्रिया अपना सिर आलोक के कन्धे पर रख लेती है और गहरी सुकून की सांस लेती है। आलोक उसे माॅ से मिलने के लिये तैयार होने को कहता है और क्लीनिक फोन करके अपने न आने की सूचना दे देता है। प्रिया अपने को अन्दर से तैयार करती है कि वह सामान्य रहे। अपने को सहज रखते हुए प्रिया घर में आगे बढ़ती है पर दरवाजे पर आने से पहले ही उसके पॅाव ठिठक जाते है। माॅ का ्रकन्दन स्वर उसे बाहर से ही सुनाई दे जाता है- ‘‘मेरी सजा लगता है मेरी मौत के बाद ही खत्म होगी।’’ आभा! जब गुनाह तुमने नही किया तो फिर सजा कैसी? आज तक समाज से तुमने साहस के साथ लड़ा हैं’’ पापा के कहते ही मां का रूआसा स्वर उभर आया-- समाज से लड़ लिया पर अपनों से हार गई। अपनी ही औलाद न मुंह देखना चाहती है और न ही भूले से यह पूछती है कि मां जिन्दा है या मर गई।

‘‘आभा ! प्रिया अभी नादान है वह आज नहंी तो कल जरूर समझेगी। समाज के तानों ने उसे सच देखने ही नही दिया है। कही न कही वह खुद सजा भुगत रही है। पहले तो वह बलात्कार की अनचाही पैदाइश है इस गम से तो उबर जाये तब तो वह तुम्हारे दर्द के बारे में सोचेगी। समय पर छोड़ दो सब ठीक हो जायेगा।’’ पर पापा का यह कहना माॅ को समझा नही सका-‘कुछ ठीक नही होगा। प्रिया की उम्र के साथ उसकी नफरत भी बढ़ती जा रही है। वह मेरे कारण न बचपन जी सकी और न आज जी पा रही है मेरे गुनाह की छाया उसके जीवन को ढंॅक दे रही है।’’ मां की बात सुनकर पापा के स्वर में रोष आ जाता है। वह तुम्हारा गुनाह नही है उनका गुनाह है जो अपने को मर्द कहते है। पर मैं उन्हें नपुंसक मानता हूँ। मां ने कहा- आप बहुत अच्छे हैं। पहले अहसास नही था पर आप से जाना है कि प्यार में बड़ी ताकत होती है। आपके दिये हुए साहस से ही समाज को जवाब दे पाई हूँ। आपको याद है कालोनी में मिसेज शर्मा ने जब आपको नामर्द कहकर हमारा मजाक उड़ाया तो आप का हाथ थामते ही न जाने कहा से शब्द आते गये और मैं उन्हें ऐसा जवाब दे पाई जो मैं खुद शायद कभी सोच नही पाती जो कह गई -मिसेज शर्मा क्या शरीर के गणित से मर्द शब्द बना है। आपका पति मर्द है इससे आप को खुशी मिल रही है पर क्या आप जानती हैं कि उसी मर्द ने मेरे ऊपर मर्दानगी दिखाई थी। आपके आॅंखे फाड़ लेने से सच्चाई नही बदल जाती आपकी निगाहंे गवाह है कि आप अपने पति की मर्दानगी से शर्मिन्दा है। मेरे अतिरिक्त और भी अनेक सच आपको पता है बस नाम आभा की जगह नीलम या निलोफर है। पर मेरी आखों में अपने पति के लिए कोई शर्म नही है क्योंकि मैं जानती हूँ कि दिन के उजाले और रात के अन्धेरे में भी हमारे बीच सिर्फ प्यार है और यहां मौजूद हर शख्स के पास वह नही है। जो मेरे पास है। दुनिया का सबसे अच्छा पति और सन्तुष्ट प्यार।’’

आभा तुमने ठीक कहा था। वह तुम्हारा साहस था मेरा तो सिर्फ साथ था।’’ पापा के कहने पर मां कह उठी- ‘‘नही सिर्फ आप के कारण। उस घटना के बाद तो मै आपसे निगाह भी नही मिला पा रही थी पर आपने जताया कि गुनाह मेरा नही है। मुझे इंसाफ दिलाने के लिए आपने क्या नही किया। लोगों ने आप को नपुंसक कहा प्रिया को बलात्कार की पैदाइश कहा जबकि आप भी जानते थे कि प्रिया आप की संतान है। आप सब सहते गये। तब तक लडे़ जब तक उन गुनहगारो को सजा नही मिली।

‘‘फिर भी उन्हें सजा दिलाने में लम्बा समय बीत गया। उन गुनहगारो की सख्त सजा दिलाने के लिये और अपनी पत्नी के प्यार के कारण मैने यह सब किया, कोई अहसान थोड़े ही था। तुम्हारा साथ और साहस जरूर......’’ प्रिया इससे आगे पापा के कहे एक भी शब्द नही सुन पाई और उल्टे पांव घर वापस आ गई। प्रिया की पूरी दुनिया ही उलट गई थी। उसे अपने आप से घृणा हो रही थी। आज उसे अहसास हुआ कि वह कितनी छिछली सतह पर जी रही थी। बेचैनी और घबराहट की स्थिति में वह बैठ जाती है। पसीना पोछने के लिए वह जैसे ही तौलिया उठाना चाहती है वैसे ही विस्तर पर उसे मां की क्षत-विक्षत देह दिखाई देने लगती है। वह चीख उठती है। अपनी बदहवास स्थिति का पता उसे कुर्सी से टकराने से होता है। आलोक दौड़कर उसे गिरने से बचाता है। प्रिया की निगाहे जैसे ही आलोक से मिलती है वैसे ही पापा साकार रूप में उसके सामने आ जाते है। वह आलोक की आँखो में पापा को देखती है वैसे ही असहाय, पीड़ा छुपाये हुए पापा। आलोक और पापा एक जैसे हैं, प्यार के लिए सब कुछ करने को तैयार और मैं ?अपनी ही दुनिया में सब भूलकर उन्हे सताती रही। भीतर की टीस बाहर आने के लिए छटपटाने लगती है पर भावों के वेग को वह आंसू बनने से रोकने का प्रयास करती है। प्रिया सोचती है पापा की आंखे कैसी दिखती होगीं जब पत्नी के बलात्कार की घटना याद आ जाती होगी। सामने से आने वाली हर अंाख पत्नी के बलात्कार को पुनः दिखाती हांेगी और प्रतिदिन उसी घटना की पुनरावृत्ति होने पर पापा ने कैसे सहा होगा और सब सहने के बाद मां के सामने सामान्य होना कितना असहज रहा होगा। क्या पापा मां को वैसे ही स्वीकार कर पाये होंगे जैसे उस घटना के पहले करते थे। मां के पास जाते ही वह घटना मस्तिष्क में कौंध नही जाती रही होगी। तब पापा भी आलोक की तरह अपने को संयत रखते रहे होगे। और मां? ............ क्या वह पूरे जीवन में एक पल भी उस घटना को भूल पाई होंगी। जब कभी आलोक मेरे साथ जबरदस्ती कर जाते है तो शरीर का हर हिस्सा दर्द उभार जाता है। उस समय जी चाहता है कि किसी धारदार चीज से शरीर के हर हिस्से को धीरे-धीरे काट दूं शायद बहता खून तपिश से चैन दे दे, या कोई ऐसा स्क्रबर हो जिससे पूरे शरीर को रगड़ दॅूं इतना रगड़ दॅूं कि वह छिल जाये और उससे रिसते खून की ठण्डी लहर तपिश को दूर कर पाये। फिर मां की तपिश तो दूसरी और गहरी थी। प्रिया के मस्तिष्क में शरीर को रगड़ती मां का अक्श उभर आता है। पर क्या वह बहता खून तपिश को कम कर पाता होगा। अपनी गर्म और जलती त्वचा को सहलाती मां क्या कभी ठण्डक महसूस कर पाई होगी ? नहीं। प्रिया के सामने बर्फ के पानी से भरी बाल्टी और उस ठण्डे पानी से नहाती अपनी तस्वीर उभर आती है पर यह क्या यह चेहरा तो मां का है। हरी घास पर नंगे पाँव चलती मां, ओस की बूदों से भीतर शीतलता का इन्तजार करती मां, आंखो में आंसू लिये हुए माँ बेचैन छटपटाती मां। और न जाने कितने अक्श प्रिया की आंखो के आगे घूम जाते हैं। वह जानती है कि दर्द और तपिश का रिश्ता क्या है। जब यह आज तक उसके अन्दर से नही जा सका है तो मां कहाँ दूर कर पाई होगी इन्हें। कहने में कितना छोटा शब्द है दर्द पर अपने अहसास में उतना ही बड़ा और गहरा है। कुछ दर्द के निशान दिखाई पड़ते है और कुछ के नही। जो नही दिखाई पड़ते है वही ज्यादा गहरे होते है। मां का दर्द छुपाये हुए चेहरा मेरा पीछा नही छोड़ता है। हाॅस्टल में रहने पर भी माॅं की आंखे और उनका चेहरा मैं कभी भूल नही पाई। जीवन में बलात्कार की पैदाइश शब्द इतना हावी हो गया कि अपने जीवन से ही भागती रही। भागते-भागते अनजाने में मां को कितना दर्द दे गई मैं। बलात्कार की पैदाइश होने का दर्द तो याद रहा पर जिसने बलात्कार की पीड़ा सही उसे मैं भूल गयी। क्या कभी मैं उस दर्द को महसूस कर सकती हूं़। मैं क्या कोइ भी स्त्री यह नहीं महसूस कर सकती है। प्रिया रोना चाहती है पर आॅसू आंखो में अटक जाते हंै। वह चीखना चाहती है पर शब्द बाहर नही आते है। वह आलोक को देखती है असहाय ,निरूपाय और किंकर्तव्यविमूढ। आलोक प्रिया के चेहरे को देखता है और द्रवित हो जाता है प्रिया का ऐसा चेहरा आज तक नहीं देखा था। वह उसे घर ले जाता है और बाहर ही छोड़कर चला जाता है। प्रिया जानती है वह अन्दर नही आयेगा क्योंकि उसे पता है कि प्रिया को समय चाहिए। प्रिया दरवाजा खोलकर अन्दर जाती है। बिस्तर पर मां और उनके बगल में पापा कुर्सी पर बैठे रहते हैं। तीनों की निगाहे एक दूसरे से मिलती है। हर आंखो में भोगी गई सजा बूँदो में रखी रहती है।


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