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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



सॉरी कहते हैं


शुचि 'भवि'


सॉरी कहते हैं सिर्फ़ बाहर से
शर्म करते वो काश अंदर से

राज़ उसका छुपा नहीं मुझसे
किस क़दर टूटा है वो भीतर से

याद जिसकी तुम्हें भिगो देगी
बचना है तुमको उस समंदर से

दोस्ती चाहे जब शुरू करिए
इसमें क्या जनवरी-दिसंबर से

रात होने दो दिन में शीतलता
मिल नहीं सकती संगमरमर से

अपने दम पे ही मिलती है दुनिया
ये भी गुण सीखिए सिकंदर से

'भवि' तेरा बचपना नहीं जाता
बच्चों जैसी है उलझी बिस्तर से

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