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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



प्यार ही बुनियाद है


शुचि 'भवि'



जान  घर  की  और है  परिवार की
प्यार  ही   बुनियाद  है  संसार  की

मेरी ख़ुशियों से  जो  बावस्ता  नहीं
चाहता दिल में जगह ग़मख़्वार की

काश!  वैसा  हो  शहीदों  के  लिए
बातें  जैसी  होती  हैं  सरकार  की

आप  क़ाबिल  हैं  बड़े  ज़रदार भी
डालिए  आदत  मगर  आभार  की

बेईमानी   छल -कपट   धोखाधड़ी
आजकल  पहचान है  व्यापार  की

प्यार उस रिश्ते में मुमकिन ही नहीं
हो तलब  जिसमें  नहीं  दीदार  की

पुतलियों में  देख  उसकी  ग़ौर  से
उसमें  सूरत 'भवि' तेरे दिलदार की

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