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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



धीरज क्यों खोता है


शुचि 'भवि'



पक्षपात  से दुख  होता  है
पर तू धीरज क्यों खोता है

फ़ानी  है  ये  दुनिया लेकिन
मानव  सपने   तो  बोता  है

चमकाता नित रूप मगर क्या
मैला   मन  भी  तू  धोता  है

अब दुख से क्या होगा मानव
अपनी  करनी  ख़ुद  ढोता  है

खेती  सरकारी  है,  उसने
खेत  दिखावे  में  जोता है

उसकी बातें बता रहीं वो
डिग्रीधारी  बस  तोता  है

लक्ष्य नहीं है जिसका कोई
जीवन भर 'भवि' वो रोता है

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