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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



कैसे?


डॉ०नीना छिब्बर


  
हर कतरे मे दर्द दिखलाऊँ भी कैसे,
दर्द के सैलाब को समझाऊं भी कैसे।

इंसानियत में छिपी रिवायशों को,
अब अनकही कहानी छुपाऊँ भी कैसे।

अरमानो के अंबार को फैलाओ भी कैसे,
मानवता का लबादा ओढे मुस्कराऊँ भी कैसे।
     
विनाश की दुनिया मे जीवन सुमन को,
नफरत की आंधियो से बचाऊँ भी कैसे?
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